तोरई की खेती कब और कैसे करें | Ridge Gourd Farming in Hindi | तोरई की खेती का समय


तोरई की खेती (Ridge Gourd Farming) से सम्बंधित जानकारी

तोरई की खेती जल्द पैदावार के लिए नगदी फसल के रूप में की जाती है | तोरई के पौधे बेल (लता) के रूप में वृद्धि करते है, इसलिए इसे लतादार सब्जियों की श्रेणी में रखा गया है | तोरई को कई स्थानों पर तोरी, झिंग्गी और तुरई नाम से भी जाना जाता है | इसके पौधों में निकलने वाले फूल पीले रंग के होते है, नर और मादा पुष्प के निकलने का समय भी अलग-अलग होता है | इन पुष्पों पर निकलने वाले फलो का उपयोग सब्जी बनाने में सबसे अधिक होता है |

बारिश का मौसम तोरई की खेती के लिए सबसे अच्छा होता है | तोरई की खेती खरीफ की फसल के साथ भी की जा सकती है | यदि आप भी तोरई की खेती करना चाहते है, तो इस लेख में आपको तोरई की खेती कब और कैसे करें (Ridge Gourd Farming in Hindi) तथा तोरई की खेती का समय इसके बारे में जानकारी दी जा रही है |

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तोरई की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Ridge Gourd Suitable Soil, Climate and Temperature)

तोरई की अच्छी फसल के लिए कार्बनिक पदार्थो से युक्त उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसकी खेती में उचित जल निकासी वाली भूमि की जरूरत होती है | सामान्य P.H. मान वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है | समशीतोष्ण जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है | इसके पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए शुष्क और आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है |

अधिक ठण्ड जलवायु इसके पौधे सहन नहीं कर पाते है | गर्मियों के मौसम में इसके पौधे अच्छे से वृद्धि करते है | तोरई के पौधे सामान्य तापमान में अच्छे से अंकुरित होते है | इसके पौधे अधिकतम 35 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है |

तोरई की उन्नत किस्में (Luffa Improved Varieties)

घिया तोरई

इसके पौधों में निकलने वाले फल गहरे हरे रंग के होते है,यह देखने में छोटी घिया की तरह होती है | यह किस्म भारत में अधिक मात्रा में उगाई जाती है, जिसमे निकलने वाला छिलका अधिक पतला होता है | इसके ताजे फलो में विटामिन की अधिक मात्रा पाई जाती है | जिन्हे सब्जी बनाने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है |

पूसा नसदार

तोरई की यह किस्म बीज रोपाई के 80 दिन बाद पैदावार देना आरम्भ कर देती है,जिसमे निकलने वाले फलो में उभरी हुई धारिया पाई जाती है | यह फल हल्का हरा और पीले रंग का होता है | यह किस्म जायद फसल के रूप में उगाई जाती है |

सरपुतिया

तोरई की इस किस्म को तैयार होने में बीज रोपाई के बाद दो महीने का समय लग जाता है | इसके पौधों में निकलने वाले फलो का आकार छोटा होता है, जो गुच्छे के रूप में लगते है | इसके फलो पर उभरी हुई धारिया दिखाई देती है, तथा छिलके की बाहरी परत मोटी और मजबूत होती है | यह किस्म अधिकतर मैदानी भागो में उगाई जाती है |

कोयम्बूर 2

यह किस्म बीज रोपाई के तक़रीबन 70 दिन बाद उत्पादन देना आरंभ कर देती है | इसमें पौधों में निकलने वाले फलो का आकार पतला और कम बीज वाला होता है | यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 250 क्विंटल की पैदावार दे देती है |

तोरई के खेत की तैयारी और उवर्रक (Luffa Field Preparation and Fertilizer)

तोरई के खेत को तैयार करने के लिए सबसे पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हलो से गहरी जुताई कर दी जाती है | इसके बाद खेत को कुछ दिनों के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है | इसके बाद खेत में प्राकृतिक खाद के रूप में 12 से 15 गाड़ी पुरानी खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डाल कर जुताई कर दी जाती है | इससे खेत की मिट्टी में खाद अच्छी तरह से मिल जाती है | यदि आप चाहे तो प्राकृतिक खाद की जगह जैविक खाद के रूप में कम्पोस्ट खाद का भी इस्तेमाल कर सकते है | खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में रोटावेटर लगाकर जुताई कर दी जाती है |

इसके बाद आखरी जुताई के समय रासायनिक खाद के रूप में एन.पी.के. की 100 से 125 KG की मात्रा को खेत में छिड़कना होता है | इसके बाद खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल बना दिया जाता है | तोरई के पौधों की रोपाई के लिए उचित दूरी रखते हुए धोरेनुमा क्यारियो को तैयार कर लिया जाता है | इसके बाद पौधों के विकास के समय 15 KG यूरिया की मात्रा को देना होता है | इससे पौधे अच्छे से विकास करते है |

तोरई के बीजो की रोपाई का सही समय और तरीका (Luffa Seeds Sowing Right time and Method)

तोरई के बीजो की रोपाई बीज और पौध दोनों ही रूप में की जाती है,किन्तु अधिकतर किसान भाई इसकी रोपाई बीज के रूप में ही करना पसंद करते है | पौधों के रूप में रोपाई के लिए अधिक समय और खर्च लगता है | इसके अलावा पौधों को नर्सरी से भी खरीद सकते है | तोरई के बीजो की रोपाई खेत में करने से पहले उन्हें थीरम या बाविस्टीन की उचित मात्रा से उपचारित कर लिया जाता है | इससे बीज आरम्भ में लगने वाले रोग से मुक्त हो जाते है | तोरई के एक हेक्टेयर के खेत में दो से तीन किलो बीज की आवश्यकता होती है | बीजो की रोपाई के लिए खेत में धौरेनुमा क्यारियों को तैयार कर लिया जाता है |

तोरई के बीजो की रोपाई मेड के अंदर डेढ़ से दो फ़ीट दूरी रखते हुए की जाती है | ताकि इससे पौधे भूमि की सतह पर अच्छे से फ़ैल सके | तैयार की गई इस क्यारियों के मध्य 3 से 4 मीटर की दूरी रखी जाती है | इसके बीजो की रोपाई खरीफ के मौसम में की जाती है | यदि आप इसकी फसल बारिश के मौसम में प्राप्त करना चाहते है, तो उसके लिए आपको बीजो की रोपाई जनवरी के माह में करनी होती है, तथा खरीफ के मौसम में फसल प्राप्त करने के लिए बीजो की रोपाई जून के महीने में की जाती है |

तोरई के पौधों की सिंचाई (Luffa Plants Irrigation)

तोरई के पौधों की सिंचाई आवश्यकतानुसार की जाती है | यदि इसके बीजो की रोपाई जून के महीने में की गई है, तो प्रारंभिक सिंचाई को बीज रोपाई के तुरंत बाद करना होता है, तथा उसके बाद तीन से चार दिन के अंतराल में हल्की-हल्की सिंचाई की जाती है, ताकि खेत में नमी बनी रहे और बीजो का अंकुरण ठीक से हो सके | इसके अलावा बारिश के मोसम में की गई रोपाई के लिए पौधों को जरूरत पड़ने पर ही पानी देना होता है |

तोरई के पौधों में खरपतवार नियंत्रण (Luffa Plants Weeds Control)

तोरई के पौधों में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए नीलाई-गुड़ाई विधि का इस्तेमाल किया जाता है | इसके पौधों की आरम्भिक गुड़ाई बीज रोपाई के 15 दिन बाद की जाती है | इसके बाद की गुड़ाई को आरम्भिक गुड़ाई के 15 से 20 दिन के अंतराल में करना होता है | इसके अलावा यदि आप रासायनिक तरीके से खरपतवार पर नियंत्रण करना चाहते है, तो आपको तोरई के खेत में बीज रोपाई से पहले बासालीन की उचित मात्रा का छिड़काव करना होता है |

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तोरई के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Luffa Plants Diseases and Prevention)

लालड़ी

इस किस्म का रोग तोरई के पौधों पर अक्सर आरम्भ में ही बीज अंकुरण के समय दिखाई देता है | यह रोग तोरई के पौधों पर कीट के रूप में आक्रमण करता है | इस रोग की सुंडी पौधों की जड़ो को खाकर उन्हें पूरी तरह से नष्ट कर देती है | यह कीट रोग देखने में चमकीले लाल रंग का होता है | तोरई के पौधों को इस रोग से बचाने के लिए नीम के तेल का छिड़काव बीज अंकुरण के समय किया जाता है |

फल मक्खी

इस किस्म का रोग पौधों पर फल लगने के दौरान आक्रमण करता है | यह फल मक्खी रोग पौधों की पत्तियों और फल पर अंडे देकर उन्हें हानि पहुंचाते है | जिसके बाद फलो पर जन्म लेने वाली सुंडी फल को हानि पहुँचाती है | इस रोग से बचाव के लिए तोरई के पौधों पर नीम के काढ़े या फिर गोमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर छिड़काव किया जाता है |

मोजैक

इस किस्म का रोग तोरई के पौधों पर विषाणु के रूप में आक्रमण करता है | यह रोग पौधों की पत्तियों पर आक्रमण कर उसके विकास को पूरी तरह से रोक देता है | जिसके कुछ समय पश्चात् ही पत्तिया मुरझा कर गिर जाती है, और पैदावार भी प्रभावित होती है | इस रोग से बचाव के लिए नीम के तेल का छिड़काव तोरई के पौधों पर किया जाता है |

जड़ सड़न

इस किस्म का रोग अक्सर खेत में जलभराव की स्थिति में देखने को मिलता है | इस रोग से प्रभावित पौधे का तना भूमि की सतह से काला पड़कर सड़ जाता है | जिसके बाद पत्तिया पूरी तरह से नष्ट हो जाती है | रोग से अधिक प्रभावित पौधा कुछ समय पश्चात् ही सूखकर नष्ट हो जाता है | इस रोग से बचाव के लिए बाविस्टीन या मेन्कोजेब की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों की जड़ो पर किया जाता है |

तोरई के फलों की तुड़ाई, पैदावार और लाभ (Luffa Fruit Harvesting, Yield and Benefits)

तोरई की उन्नत किस्मो को बीज रोपाई के बाद तैयार होने में 70 से 80 दिन का समय लग जाता है| इसके फलो की तुड़ाई कच्चे के रूप में की जाती है, जिसका इस्तेमाल सब्जी के रूप में करते है | यदि आप बीज के रूप में फसल प्राप्त करना चाहते है, तो उसके लिए आपको फल के पकने तक इंतजार करना होता है| इसके लिए फलो की तुड़ाई सप्ताह में एक बार की जाती है | फलो को तोड़ते समय डंठल से कुछ दूरी पर तोड़ना चाहिए| इससे फल अधिक समय तक ताज़ा बना रहता है |

उन्नत किस्मो के आधार पर तोरई के एक हेक्टेयर के खेत से 250 क्विंटल की पैदावार प्राप्त की जा सकती है| तोरई का बाज़ारी भाव 5 से 10 रूपए प्रति किलो होता है, जिससे किसान भाई इसकी एक बार की फसल से सवा लाख तक की कमाई कर अच्छा लाभ कमा सकते है |

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