शकरकंद की खेती कैसे करें | Sweet Potato in Hindi | शकरकंद का रेट


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शकरकंद की खेती (SWEET POTATO FARMING) से सम्बंधित जानकारी

शकरकंद एक कंद वर्गीय सब्जी फसल है, इसकी खेती आलू की खेती की तरह ही की जाती है | इसके पौधे भूमि के अंदर और बाहर दोनों ही जगह विकास करते है | भूमि के ऊपर इसके पौधों का फैलाव बेल के रूप में होता है | पूरे विश्व में शकरकंद का सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाला देश चीन है, तथा भारत का इसके उत्पादन में 6वां स्थान प्राप्त है | शकरकंद को उबालकर और भूनकर ऐसे ही खाया जाता है, इसके अलावा इसे सब्जी बनाकर भी खाते है | आलू की अपेक्षा शकरकंद में स्टार्च और मिठास अधिक मात्रा में पाई जाती है | शकरकंद में पर्याप्त मात्रा में विटामिन पाया जाता है, जिस वजह से शकरकंद का सेवन करने से चेहरे पर चमक और बालो में भी वृद्धि होती है |

इसके अतिरिक्त कई बीमारियों के लिए भी यह लाभदायक होती है | सामान्य तौर पर शकरकंद की खेती पूरे भारत में की जा सकती है, किन्तु मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र कुछ ऐसे राज्य है, जहाँ पर शकरकंद का उत्पादन अधिक मात्रा में किया जाता है | इसकी खेती समुद्र तल से 1600 मीटर की ऊंचाई पर की जाती है | यदि आप भी शकरकंद की खेती करने का मन बना रहे है, तो इस लेख में आपको शकरकंद की खेती कैसे करें (Sweet Potato in Hindi) तथा शकरकंद का रेट कितना है, इसकी जानकारी दी गई है |

आलू की खेती कैसे करें

शकरकंद की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Sweet Potatoes Cultivation Suitable Soil, Climate and Temperature)

शकरकंद की खेती व्यापारिक तौर पर अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए बलुई दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसकी खेती में भूमि उचित जल निकासी वाली होनी चाहिए | कठोर, पथरीली और जल भराव वाली भूमि में इसकी खेती नहीं करे, क्योकि ऐसी जगहों पर इसके कंद ठीक से विकास नहीं कर पाते है, और पैदावार भी प्रभावित होती है | इसकी खेती में भूमि का P.H.मान 5.8 से 6.8 के मध्य होना चाहिए |

शकरकंद का पौधा उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला होता है, तथा भारत में इसकी खेती तीनो ही मौसमो में की जा सकती है | यदि आप शकरकंद की खेती व्यापारिक तौर पर करना चाहते है, तो उसके लिए आपको इसे गर्मियों के मौसम में उगाना होता है | क्योकि गर्मी और बारिश के मौसम में इसके पौधे अच्छे से विकास करते है | सर्दियों का मौसम इसके पौधों की वृद्धि के लिए अच्छा नहीं माना जाता है | इसकी खेती में 80 से 100 CM वर्षा की आवश्यकता होती है |

शकरकंद के पौधों को आरंभ में अंकुरित होने के लिए 22 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है | अंकुरण के बाद पौध विकास के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है | इसके पौधे न्यूनतम 22 डिग्री तथा अधिकत्तम 35 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है | अधिक तापमान में पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है |

शकरकंद की उन्नत किस्में (Sweet Potato Improved Varieties)

वर्तमान समय में शकरकंद की कई उन्नत किस्मो को उगाया जा रहा है| रंग और उत्पादन के आधार पर यह किस्में तीन प्रजातियों में बांटी गई है| जिसमे कंद लाल, पीले और सफ़ेद रंग के पाए जाते है|

पीली प्रजाति की शकरकंद

इस किस्म की शकरकंद में पानी की मात्रा काफी कम होती है, तथा इसमें विटामिन ए अधिक मात्रा में पाया जाता है |

भू सोना

इस किस्म के कंदो का छिलका और गुदा दोनों ही पीले रंग का होता है | यह किस्म भारत के दक्षिण राज्यों में अधिक उगाई जाती है, तथा इसके पौधों में 14 प्रतिशत तक बीटा केरोटीन पाया जाता है | शकरकंद की यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 20 टन का उत्पादन दे देती है |

एस टी 14

इस क़िस्म के पौधे 105 से 110 दिन में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते है | इसके कंदो का बाहरी रंग पीला तथा अंदर से यह हरापन लिए हुए होते है | यह क़िस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 15 से 20 टन का उत्पादन दे देती है |

लाल प्रजाति की शकरकंद

इस प्रजाति की शकरकंद सामान्य रूप से खुरखुरी होती है | जिस वजह से इस प्रजाति की कंद को अधिक सहनशील और शक्तिशाली माना जाता है |

भू कृष्णा

इस क़िस्म की कंद का बाहरी रंग पीला मटियाला होता है | किन्तु इसके अंदर निकलने वाला गुदा लाल रंग का पाया जाता है | भारत के दक्षिण राज्यों में यह क़िस्म अधिक उगाई जाती है | यह क़िस्म केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान, तिरुवनंतपुरम द्वारा तैयार की गई है | इसका कुल उत्पादन 18 टन प्रति हेक्टेयर होता है |

एस टी 13

इस क़िस्म के कंदो को तैयार होने में पौध रोपाई से 110 से 115 दिन का समय लग जाता है, तथा इसके कंदो का गुदा लाल रंग का होता है | शकरकंद की यह क़िस्म अधिक समय तक भंडारित की जा सकती है, जिसमे प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 15 टन का उत्पादन प्राप्त हो जाता है |

सफ़ेद प्रजाति की शकरकंद

इस प्रजाति की शकरकंद में पानी की अधिक मात्रा पाई जाती है | सफ़ेद प्रजाति के कंदो को भूनकर खाने के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है |

पंजाब मीठा आलू 21

यह क़िस्म पंजाब में सबसे अधिक उगाई जाती है | इसके पौधों को तैयार होने में 140 से 145 दिन का समय लग जाता है, तथा इसके कंदो में सफ़ेद रंग का गुदा पाया जाता है | इस क़िस्म के पौधे प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 22 टन का उत्पादन दे देते है |

श्री अरुण

इस क़िस्म के पौधों को कम समय में अधिक पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है, जिसकी फसल पौध रोपाई के 100 दिन बाद पैदावार देना आरम्भ कर देती है | सेंट्रल ट्यूब क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट, श्रीकरियम के द्वारा इस क़िस्म को तैयार किया गया है | जिसमे कंद का बाहरी रंग गुलाबी तथा गुदा क्रीम रंग का होता है | यह क़िस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 30 टन का उत्पादन दे देती है |

इसके अतिरिक्त भी शकरकंद की कई उन्नत किस्मे है, जिन्हे अलग-अलग जगहों पर अधिक पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है | जो कि इस प्रकार है :- श्री रतना, सीओ- 1, 2, श्री वर्धिनी, श्री नंदिनी, भुवन संकर, श्री वरुण, कोनकन, एच- 41, क्लास 4, एच- 268, जवाहर शकरकंद- 145, वर्षा, पूसा सुहावनी, पूसा रेड, राजेंद्र शकरकंद, अशवनी और कलमेघ आदि |

शकरकंद के खेत की तैयारी और उवर्रक (Sweet Potato Field Preparation and Fertilizer)

शकरकंद की खेती के लिए भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसके लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लिया जाता है | खेत को तैयार करने के लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह से मिट्टी पलटने वाले हलो से जुताई कर दी जाती है | इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते है | खेत की जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है | इससे खेत की मिट्टी में सूर्य की धूप अच्छे से लग जाती है | शकरकंद की अच्छी पैदावार के लिए खेत में खाद की अच्छी मात्रा देनी होती है |

इसके लिए खेत की पहली जुताई के पश्चात प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में 15 से 17 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद दी जाती है | इसके अलावा यदि आप चाहे तो गोबर की खाद के स्थान पर जैविक खाद का भी इस्तेमाल कर सकते है | खाद को मिट्टी में डालने के बाद कल्टीवेटर के माध्यम से दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है | इससे खेत की मिट्टी में खाद अच्छी तरह से मिल जाती है | इसके बाद खेत में पानी लगाकर पलेव कर दिया जाता है | पलेव के बाद जब खेत की मिट्टी ऊपर से सूखी दिखाई देने लगती है, उस दौरान खेत की फिर से रोटावेटर लगाकर जुताई कर दी जाती है |

इससे खेत में मौजूद मिट्टी के ढेले टूट जाते है, और मिट्टी भुरभुरी हो जाती है | मिट्टी के भुरभुरा होने के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है | जिससे खेत में जलभराव की समस्या नहीं देखने को मिलती है | शकरकंद के पौधों की रोपाई मेड़ो पर की जाती है, इसके लिए खेत में उचित दूरी रखते हुए मेड़ो को तैयार कर लिया जाता है | जिसमे प्रत्येक मेड़ के मध्य दो से तीन फ़ीट की दूरी रखी जाती है |

शकरकंद की खेती में यदि आप रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहते है, तो उसके लिए आपको प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 70 KG फास्फोरस, 60 KG पोटाश और 40 KG नाइट्रोजन की मात्रा का छिड़काव खेत की आखरी जुताई के समय करना होता है | इसके अतिरिक्त 40 KG यूरिया की मात्रा को पौधों सिंचाई के दौरान दे |

शकरकंद के पौधों की रोपाई का सही समय और तरीका (Sweet Potato Plants Transplanting Right time and Method)

शकरकंद के पौधों की रोपाई नर्सरी में तैयार की गई कटिंग के रूप में की जाती है | इसके लिए पौधों को एक महीने पहले तैयार कर लिया जाता है | इसके लिए नर्सरी में बीजो को लगाकर उसकी बेल को तैयार कर लिया जाता है, जिसके बाद उसे उखाड़ कर उसकी कटिंग कर रोपाई के लिए तैयार करते है | इसके अतिरिक्त यदि किसान भाई चाहे तो किसी रजिस्टर्ड नर्सरी से भी पौधों को खरीद सकते है | इसके बाद इन पौधों की रोपाई तैयार की गई मेड़ पर की जाती है |

इसके प्रत्येक पौधे के मध्य एक फ़ीट की दूरी रखी जाती है, तथा कटिंग को 20 CM की गहराई में भूमि में लगाया जाता है | पौध रोपाई के बाद उसे चारो तरफ से मिट्टी से अच्छी तरह से ढक देते  है | शकरकंद के पौधों की रोपाई समतल भूमि में भी का जा सकती है, इसके लिए उन्हें क्यारियों में तैयार कतारों में लगाया जाता है | जिसमे प्रत्येक कतार के मध्य दो फ़ीट की दूरी रखी जाती है | इसके बाद पौधों को 40 CM की दूरी पर लगाया जाता है |

सामान्य तौर पर इसके पौधों की रोपाई किसी भी मौसम में की जा सकती है, किन्तु शकरकंद की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए गर्मी और बारिश का मौसम सबसे अच्छा माना जाता है | जायद के मौसम में इसके पौधों की रोपाई जून से अगस्त माह के मध्य की जाती है | जिसके बाद इसकी फसल खरीफ की फसल के साथ तैयार हो जाती है |

शकरकंद के पौधों की सिंचाई (Sweet Potato Plants Irrigation)

शकरकंद के पौधों की सिंचाई की गई रोपाई के आधार पर की जाती है | यदि इसके पौधों की रोपाई गर्मी के मौसम में की गई है, तो पौध रोपाई के तुरंत बाद उन्हें पानी देना चाहिए | इस दौरान इसके पौधों की सिंचाई सप्ताह में एक बार की जाती है | इससे खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी बनी रहती है, और कंदो का विकास अच्छे से होता है | यदि पौधों की रोपाई बारिश के मौसम में की गई है, तो उन्हें अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | इसके अलावा यदि वर्षा समय पर नहीं होती है, तो उन्हें जरूरत के हिसाब से पानी देना होता है |

शकरकंद के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण (Sweet Potato Plants Weed Control)

शकरकंद की फसल में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए प्राकृतिक और रासायनिक दोनों ही विधियों का इस्तेमाल किया जाता है | रासायनिक विधि द्वारा खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए कंद अंकुरण से पूर्व खेत में मेट्रीबिउज़ाइन और पैराकुए की उचित मात्रा का छिड़काव दिया जाता है |

इसके अतिरिक्त यदि आप प्राकृतिक विधि द्वारा खरपतवार को ख़त्म करना चाहते है, तो उसके लिए आपको पौधों की निराई- गुड़ाई करनी होती है | जब इसके पौधों का अंकुरण होने लगे उस दौरान इसके पौधों की पहली गुड़ाई अंकुरण के 20 दिन बाद की जाती है | जिसके बाद 25 दिन के अंतराल में पौधों की दूसरी और तीसरी गुड़ाई की जाती है |

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शकरकंद के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Sweet Potato Plants Diseases and Prevention)

शकरकंद का घुन

इस क़िस्म का रोग पौधों की पत्तियों पर आक्रमण करता है | इस रोग का कीट पौधों की पत्ती और बेल को खाकर नष्ट कर देता है, जिससे पौधे का विकास पूरी तरह से रुक जाता है | शकरकंद के पौधों को इस रोग से बचाने के लिए रोगर दवा की उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता है |

फल बेधक रोग

इस क़िस्म का रोग किसी भी समय कंदो पर आक्रमण कर सकता है | फल बेधक रोग की सुंडी कंद के अंदर सुरंग कर उन्हें पूरी तरह से नष्ट कर देती है | जिसके कुछ समय पश्चात् ही फल सड़कर नष्ट हो जाता है | इस रोग से बचाव के लिए कार्बरील की उचित मात्रा से भूमि को पौध रोपाई से पहले उपचारित कर लिया जाता है | इसके अलावा यदि यह रोग खड़ी फसल पर देखने को मिले तो कार्बरील की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर करे |

माहू

शकरकंद के पौधों पर माहू रोग कीट के रूप में आक्रमण करता है | इस रोग के कीट आकार में अधिक छोटे और देखने में लाल, हरे, काले और पीले रंग के होते है | यह रोग पौधों और पत्तियों के नाजुक अंगो पर आक्रमण करता है | जिसके कुछ समय पश्चात् ही पौधा विकास करना बंद कर देता है, और अधिक प्रभाव बढ़ने पर सम्पूर्ण पौधा सूखकर नष्ट हो जाता है | इस रोग से बचाव के लिए शकरकंद के पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड की उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता है |

शकरकंद का रेट, खुदाई और पैदावार (Sweet Potato Tubers Digging, Yield and Benefits)

शकरकन्द की उन्नत किस्मो को तैयार होने में 110 से 120 दिन का समय लग जाता है | जब इसके पौधों पर लगी पत्तिया पीले रंग की दिखाई देने लगे उस दौरान इसके कंदो की खुदाई कर ली जाती है | कंदो की खुदाई से पूर्व खेत में हल्का पानी लगा दे, इससे खेत की मिट्टी नर्म हो जाती और कंद आसानी से निकाले जा सकते है | कंदो की खुदाई के बाद उन्हें अच्छी तरह से साफ कर अच्छे से सुखा लिया जाता है | एक हेक्टेयर के खेत में तक़रीबन 25 टन की पैदावार प्राप्त हो जाती है | शकरकंद का बाज़ारी भाव 10 रूपए प्रति किलो के आसपास होता है, जिससे किसान भाई इसकी एक बार की फसल से सवा लाख से अधिक की कमाई आसानी से कर सकते है |

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