केले की खेती कैसे करें | Banana Farming in Hindi | केला के प्रकार

केले की खेती (Banana Farming) से सम्बंधित जानकारी

केले की खेती लोकप्रिय फल के रूप में की जाती है, यह पूरे वर्ष किसी भी मौसम में पाया जाने वाला फल है, केले में कई तरह के पोषक तत्व मौजूद होते है, जो मानव शरीर के लिए काफी लाभदायक होते है | इसमें फास्फोरस, शर्करा और कैल्शियम की मात्रा अधिक पाई जाती है, जिस वजह से केले का सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है | केले का इस्तेमाल खाने के अलावा आटा, सब्जी और चिप्स को बनाने में भी किया जाता है | महाराष्ट्र में केले का उत्पादन अधिक मात्रा में किया जाता है, तथा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी केले की खेती उच्च स्तर पर की जाती है |

इसके पौधों में निकलने वाले पत्तो का आकार तक़रीबन 2 मीटर लम्बा और अधिक चौड़ा होता है, जो कि सबसे लम्बा पत्ता भी कहलाता है | इस वजह से इसके पत्तो पर भोजन भी किया जाता है, तथा इसके पौधों को सजाने के लिए इस्तेमाल में लाते है | केले की मांग पूरे वर्ष रहती है, जिससे इसको बेचना भी काफी आसान होता है, और किसान भाई केले की खेती कर अच्छा लाभ भी कमा सकते है | यदि आप भी केले की खेती करने का मन बना रहे है, तो इस लेख में आपको केले की खेती कैसे करें (Banana Farming in Hindi) तथा केला के प्रकार इसके बारे में जानकारी दी जा रही है |

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केले की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Banana Cultivation Suitable Soil, Climate and Temperature)

केले की खेती के लिए जीवांश युक्त दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है, तथा इसकी खेती के लिए उचित जल निकासी वाली भूमि का होना भी जरूरी है | जलभराव वाली भूमि में इसकी खेती करने से पौधों पर रोग लगने का खतरा अधिक होता है | इसकी खेत में भूमि का P.H. मान 6 से 8 के मध्य होना चाहिए |

केले की खेती में जलवायु का भी बहुत अधिक महत्व होता है | इसके पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है | बारिश का मौसम पौधों की वृद्धि के लिए अच्छा माना जाता है,लेकिन बारिश से खेत में जलभराव न होने दे | इसके पौधे अधिकतम 40 डिग्री तथा न्यूनतम 14 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है |

केला की उन्नत किस्में (Banana Improved Varieties)

रोवेस्टा

केले की इस किस्म को अधिक समय तक भंडारित किया जा सकता है | इसके पौधे 3 से 4 मीटर लम्बे होते है, जिसके एक घेरे का वजन तक़रीबन 25 से 30 KG तक पाया जाता है | इसके अंदर 200 से अधिक फलियां पाई जाती है, तथा पौधे में लगने वाला फल अधिक चमकीला और पीले रंग का होता है |

बत्तीसा

केले की इस क़िस्म को सबसे अधिक सब्जी के लिए उगाया जाता है | इसके पौधों में घेरो की लम्बाई अधिक पाई जाती है, तथा एक घेरे में 240 से 300 तक फलियां निकलती है |

कुठिया

कुठिया क़िस्म के केले सब्जी और फल दोनों ही उपयोग के लिए उगाये जाते है | इसके कच्चे फलो की सब्जी का स्वाद काफी अच्छा होता है, तथा फल आकार में सामान्य होते है | इसके पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है,जिसके एक घेरे का वजन 25 KG तक पाया जाता है |

केले के खेत की तैयारी और उवर्रक (Banana Field Preparation and Fertilizer)

केले के पौधों को खेत में लगाने से पहले उसके खेत को एक महीने पहले तैयार कर लिया जाता है | इसके लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई कर दी जाती है | जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है | इसके बाद खेत में रोटावेटर लगाकर दो से तीन तिरछी जुताई करवा दे | इससे खेत की मिट्टी पूरी तरह से भुरभुरी हो जाएगी | मिट्टी के भुरभुरा हो जाने के बाद पाटा लगाकर खेत की मिट्टी को समतल कर दे | इसके बाद खेत में पौध रोपाई के लिए गड्डो को तैयार कर लिया जाता है |

इन गड्डो को पंक्तियों में तैयार किया जाता है, तथा पंक्तियों में तैयार किये गए गड्डो के मध्य डेढ़ मीटर की दूरी अवश्य रखे | यह गड्डे एक फ़ीट गहरे और चौड़े होने चाहिए | गड्डो को खोदने के पश्चात् इन गड्डो में उचित मात्रा में उवर्रक देना होता है, जिसके लिए 25 KG पुरानी गोबर की खाद और 100 GM बी. एच. सी. की मात्रा को मिट्टी में अच्छे से मिलाकर गड्डो में भरना होता है | इसके बाद इन गड्डो की सिंचाई कर दे |

इन गड्डो को एक महीने पहले तैयार कर लिया जाता है | एक महीने पश्चात इन गड्डो में छोटा सा गड्डा बनाकर पौधों की रोपाई कर दी जाती है | पौध रोपाई के एक महीने बाद 60 GM नाइट्रोजन की मात्रा पौधों को देनी होती है | यह क्रिया तीन महीने तक दोहराई जाती है | इसके बाद जब पौधों पर फूल बनने लगे उस दौरान 60 GM नाइट्रोजन की मात्रा पौधों को दे |

केले के पौधों की रोपाई और उवर्रक की मात्रा (Banana Plants Transplanting and Fertilizer Quantity)

केले के बीजो की रोपाई पौध के रूप में की जाती है | इसलिए इसके पौधों को किसी रजिस्टर्ड नर्सरी से खरीद लेना चाहिए | ख़रीदे गए पौधे बिल्कुल स्वस्थ और अच्छी क़िस्म के होने चाहिए | इन पौधों की रोपाई के लिए 15 मई से 15 जुलाई का महीना उपयुक्त माना जाता है, तथा जून का महीना भी पौध रोपाई के लिए उचित होता है, क्योंकि बारिश के मौसम में केले के पौधे अच्छे से वृद्धि करते है | इसके पौधों को लगाने से पूर्व उन्हें बाविस्टीन से उपचारित कर लिया जाता है | इसके बाद इनकी रोपाई तैयार किये गए गड्डो में कर दी जाती है |

केले के पौधे की सिंचाई (Banana Plant Irrigation)

यदि केले के पौधों की रोपाई बारिश के मौसम में की गई है, तो इसके पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | इसकी पहली सिंचाई को पौध रोपाई के तुरंत बाद कर दिया जाता है | इसके अलावा गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को हफ्ते में एक बार पानी देना होता है, तथा सर्दियों के मौसम में10 से 12 दिन के अंतराल में पानी दे | बारिश के मौसम में पौधों की सिंचाई जरूरत पड़ने पर ही की जाती है |

केले के पौधों में खरपतवार नियंत्रण (Banana Plants Weed Control)

केले के पौधों में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्राकृतिक विधि का इस्तेमाल किया जाता है | केले के पौधों को अधिक गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती है | इसके पौधों की पहली गुड़ाई एक महीने बाद की जाती है, तथा इसके बाद खेत में खरपतवार दिखाई देने पर उनकी गुड़ाई कर देनी चाहिए |

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केले के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Banana Plant Diseases and Their Prevention)

उकठा रोग

इस क़िस्म का रोग केले के पौधों पर फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम नामक फफूंद की वजह से दिखाई देता है | यह रोग पौधों की पत्तियों पर आक्रमण करता है, जिससे पत्तिया पीली पड़कर मुरझाने लगती है | रोग के अधिक प्रभावित होने पर पौधे का तना फटने लगता है | यह रोग अधिकतर जलभराव की स्थिति में देखने को मिलता है | इस रोग की रोकथाम के लिए केले के पौधों की जड़ो में जिलेटिन केप्सूल में बाविस्टीन की 50 GM की मात्रा को भरकर रखना होता है, बाविस्टीन का छिड़काव भी पौधों की जड़ो पर करना होता है |

लीफ स्पाट

लीफ स्पॉट क़िस्म का रोग सिंगाटोका नाम से भी जाना जाता है | इस क़िस्म का रोग पौधों पर स्यूडो सर्कोस्पोरा म्यूसी फफूंद के कारण देखने को मिलता है | यह कीट रोग पौधों की पत्तियों का रस चूस लेता है, जिससे पत्तियों में क्लोरोफिल की मात्रा बहुत कम हो जाती है, और पत्तियों का रंग हरे से भूरा दिखाई देने लगता है | इस रोग का प्रकोप अधिक बढ़ने पर पत्तिया काले रंग की हो जाती है, जिसके कुछ समय पश्चात ही पौधा पूरी तरह से नष्ट हो जाता है | इस रोग की रोकथाम के लिए केले के पौधों पर प्रोपिकोनाजोल, बाविस्टीन या डाइथेन एम-45 में से एक का छिड़काव करना होता है |

थ्रिप्स

इस क़िस्म का रोग पौधों के फलो को अधिक हानि पहुँचाता है | यह रोग फल के गुदे को प्रभावित नहीं करता है, किन्तु फल का ऊपरी हिस्सा बदरंग दिखाई देने लगता है | केले के पौधों को इस रोग से बचाने के लिए मोनोक्रोटोफास की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर किया जाता है |

लेस विंग बग

इस क़िस्म का रोग अक्सर पौधों की पत्तियों पर दिखाई देता है | लेस विंग बग रोग पौधों की पत्तियों पर आक्रमण करता है, जिससे पत्तिया पीले रंग की दिखाई देने लगती है | यह कीट रोग पत्तियों की निचली सतह से रस चूस कर हानि पहुँचाता है | मोनोक्रोटोफास की उचित मात्रा का छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है |

केले के फलो की तुड़ाई, पैदावार और लाभ (Banana Fruit Harvesting, Yield and Benefits)

केले के फलो की तुड़ाई दो तरह से की जाती है | इसकी पहली तुड़ाई कच्चे फल के रूप में की जाती है, जिसे सब्जी और आटे को बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है | दूसरी तुड़ाई फलो के पकने के दौरान की जाती है | इसके लिए जब फलो का रंग पीला दिखाई देने लगे तब उनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए | केले के एक घेरे का वजन तक़रीबन 20 से 25 KG होता है, जिससे एक हेक्टेयर के खेत से किसान भाई लगभग 60 से 70 टन की सालाना पैदावार प्राप्त कर सकते है | केले का बाज़ारी भाव 10 रूपये प्रति किलो होता है, जिससे एक हेक्टेयर के खेत में केले की एक बार की फसल से किसान 6 लाख तक की कमाई कर अच्छा लाभ कमा सकते है |

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