करेले की खेती कैसे होती है | Bitter Melon Farming in Hindi | लाभ | उन्नत किस्में

करेले की खेती (Bitter Melon Farming) से सम्बंधित जानकारी

करेले की खेती लगभग भारत के सभी राज्यों में की जाती है| करेले में विभिन्न प्रकार के औषधीय गुण पाए जाते है, जिसके कारण बाज़ारों में इसकी मांग अधिक रहती है| सबसे खास बात यह है, कि करेले की खेती में लागत के मुकाबले आय अधिक होती है| करेले को सब्जी के आलावा लोग इसका अचार भी अत्यधिक पसंद करते है, इसके साथ ही इसका जूस भी बनाते है| करेले के बीज से विभिन्न प्रकार के रोगों की दवाईयाँ भी बनायी जाती है|

दरअसल करेले की फसल एक ऐसी फसल है, जिसे लगाने के लगभग 75 से 85 दिनों के बाद किसानों को उत्पादन मिलनें लगता है और यह उत्पादन लगभग 3 से 4 महीनें तक निरंतर होता रहता है| कुल मिलाकर किसानों के लिए करेले की खेती करना काफी लाभप्रद होता है | करेले की खेती कैसे करे, करेला लगाने की विधि, लाभ और इसकी उन्नत किस्मों के बारें में यहाँ पूरी जानकारी दी जा रही है|        

करेले की खेती कैसे करे ( How To Cultivate Bitter Gourd)

किसी भी फसल के बेहतर उत्पादन के लिए किसान को उस फसल से सम्बंधित बीज, जलवायु, पानी, उर्वरक आदि के बारें में उपयुक्त जानकारी होना आवश्यक है| भारत में अधिकांश किसान करेले की फसल का उत्पादन 1 वर्ष में दो बार करते है| सर्दियों के समय में बोये जाने वाले करेले की किस्मों को जनवरी-फरवरी में बुआई कर मई-जून में इसका उत्पादन प्राप्त कर लेते है| जबकि गर्मियों के समय में करेले की किस्मों की बुआई जून और जुलाई में करने के पश्चात इसकी उपज दिसंबर तक मिल जाती है|

यदि हम करेले की फसल से लाभ की बात करे, तो करेले की फसल प्रति एकड़ लागत लगभग  20 से 25 हज़ार रुपये आती है और 1 एकड़ में किसान को लगभग 50 से 60 क्विंटल तक उत्पादन मिल जाता है। इस प्रकार किसान करेले की एक एकड़ से लगभग 2 लाख रुपये की आय प्राप्त होती है | यदि इसमें से लागत और परिश्रम निकाल दिया जाये, तो कृषक को एक फसल में लगभग 1 लाख 40 हजार की आय प्राप्त होती है |  इस तरह करेला की खेती से किसानों को अच्छा फ़ायदा मिलता है। करेले की फसल के उत्पादन के लिए कुछ विशेष प्रकार की जानकारी का होना आवश्यक है, जो इस प्रकार है- 

करेले की खेती के लिए जलवायु (Climate)

करेले की फसल के लिए गर्म और आद्र जलवायु अत्याधिक उपयुक्त मानी जाती है | यदि हम तापमान की बात करे, तो फसल की अच्छी ग्रोथ के लिए न्यूनतम तापमान 20 डिग्री सेंटीग्रेट और अधिकतम तापमान 35 से 40 डिग्री सेंटीग्रेट के बीच होना चाहिए |

करेले की खेती के लिए मिट्टी (Soil)

करेले की फसल बोनें के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त मानी जाती है| चूँकि करेले की फसल को मध्यम गर्म तापमान की आवश्यकता होती है, इसलिए खेत में जल निकासी की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए अर्थात खेत में पानी को आवश्यकतानुसार निकला जा सके | हालाँकि करेले की फसल बोनें के लिए नदी के किनारे वाली जलोढ़ मिट्टी भी अच्छी मानी जाती है| 

करेले के खेत की तैयारी (Farm Preparation)

करेले की फसल की बुवाई से पहले जमीन की अच्छी तरह से जुताई की जाती है| इसके पश्चात भूमि को पाटे की सहायता से समतल किया जाता है| इसके बाद लगभग दो-दो फीट पर क्यारियाँ बनायी जाती है, इन क्यारियों की ढाल के दोनों ओर लगभग 1 से 1.5 मीटर की दूरी पर बीजों को रोपित करना चाहिए| 

करेले की खेती की बुवाई का समय (Time Of Sowing)

भारत में किसानों को किसी भी प्रकार की फसल के उत्पादन के लिए सबसे बड़ी समस्या वातावरण और पानी है | चूँकि करेले की खेती में पानी की आवश्यकता काफी अधिक होती है, यदि इस फसल को पानी देने में जरा सी चुक हो जाती है, तो फसल सूखनें का भय सबसे अधिक होता है | गर्मी के मौसम की फसल के लिए जनवरी से मार्च तक इसकी बुवाई की जाती है | मैदानी इलाकों में बारिश के मौसम की फसल के लिए इसकी बुवाई जून से जुलाई के बीच की जाती है, और पहाड़ियों में मार्च से जून तक बीज बोया जाता है|

करेला लगाने की विधि (Method of Planting Bitter Gourd)

हमारे देश में किसान फसलों का उत्पादन अपनी सहूलियत को देखते हुए करते है | भारत में कई किसान करेले के बीजों को सीधे खेत में बुआई कर देते है और कुछ किसान नर्सरी से पौधे लाकर उनकी रोपाई करते है| हालाँकि नर्सरी विधि अधिक लाभकारी और पौधौ के लिए रोगमुक्त मानी जाती है | यदि आप करेले की फसल का उत्पादन अच्छी मात्रा में करना चाहते है तो आपको नर्सरी विधि अपनानी चाहिए |  

यदि आप खेत में डायरेक्ट बीज बोना चाहते है, तो आपको सबसे पहले बीजो को लगभग 10 से12 घण्टे भिगोकर रखना चाहिए| इसके पश्चात बीजो की बुआई से लगभग 1 घंटे पहले मेनकोजेब दवा को मिलाकर उनकी बुआई करना चाहिए | बीजों की बुआई करते समय इस बात का ध्यान रखे, कि बीज भूमि में लगभग 2 से 2 .5 सेमी गहराई पर होना चाहिए |       

करेले की खेती के लिए उर्वरक (Fertilizers)

किसी भी खेत में उर्वरक का इस्तेमाल उस खेत की मिट्टी की उर्वरता पर निर्भर करती है| हालाँकि करेले की फसल को बुवाई या पौधों को रोपाई से पहले गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद डालना आवश्यक होता है| चूँकि करेले की फसल बहुत जल्द रोगग्रस्त ही जाती है प्रायः कीड़े इसकी जड़ों से लेकर बाक़ी हिस्सों तक पहुंचकर पौधे को बेकार कर देते है|  सुंडी रोग, रेड बीटल और माहू रोग इस फसल को सबसे अधिक प्रभावित करते है| इसलिए कीटनाशक या रासायनिक खाद का इस्तेमाल कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर समय-समय पे करते रहना चाहिए |

करेले की खेती की निराई-गुड़ाई (Weeding Hoeing)

करेले की फसल को खरपतवार से बचानें के लिए समय-समय पर खेत की निराई-गुड़ाई करना होता है | मुख्य रूप से खेत की पहली निराई बुवाई के लगभग 1 माह अर्थात 30 दिन बाद करनी चाहिए और बाद की निराई मासिक अंतराल पर की जाती है |

करेले की खेती के फलों की तुड़ाई (Fruit Picking)

मुख्य रूप से करेले की फसल बुआई से लगभग 2 माह या 60 से 75 दिनों में तैयार हो जाती है | फसल तैयार होनें के पर फलों की तुड़ाई फलों का रंग, उनका आकार आदि को ध्यान में रखकर की जाती है | वैसे तो फलो की तुड़ाई मुलायम एवं छोटी अवस्था मे ही कर लेनी चाहिए। फलों को तोड़ते समय इस बात का ध्यान रखे कि फलों के साथ में डंठल की लम्बाई 2 सेंटीमीटर से कम नहीं होनी चाहिए| इससे फल अधिक समय तक टिके हुए रहते हैं| कटाई सुबह के समय करनी चाहिए और फलों को कटाई के बाद छाया में रखना चाहिए |

करेले की उन्न्त किस्मे (Bitter Gourd Varieties)

करेले की प्रमुख उन्न्त किस्मे इस प्रकार है-

  • कल्याणपुर बारहमासी
  • पूसा विशेष
  • हिसार सलेक्शन
  • कोयम्बटूर लौंग
  • अर्का हरित
  • प्रिया को-1
  • एस डी यू- 1
  • कल्याणपुर सोना
  • पूसा शंकर-1
  • पूसा हाइब्रिड-2
  • पूसा औषधि
  • पूसा दो मौसमी
  • पंजाब करेला-1
  • पंजाब-14,
  • सोलन हरा और सोलन सफ़ेद