गुड़मार की खेती कैसे करें | Gudmar Plant Information in Hindi | मधुनाशिनी का पेड़


गुड़मार की खेती (gudmar plant farming) से सम्बंधित जानकारी

गुड़मार एक औषधीय पौधा है, जो लताओं के रूप में फैलता है, इसकी खेती पूरी दुनिया में अधिक मात्रा में की जाती है | गुड़मार के पौधे दो वर्ष में पैदावार देना आरम्भ कर देते है, तथा इसका पूर्ण विकसित पौधा कई वर्षो तक पैदावार दे देता है | जिसमे निकलने वाले पत्ते रोयेंदार होते है | यह एक ऐसा पौधा है, जिसकी पत्ती खाने के बाद आपको हर मीठी चीज फीकी ही लगेगी, जिसके बाद आप किसी भी चीज की मिठास का अनुभव नहीं ले पाएंगे | यही वजह है, कि इसके पौधे शुगर डिस्ट्रॉयर और मधुनाशिनी के नाम से भी जाने जाते है |

गुड़मार औषधीय रूप से पीलिया, दमा, मधुमेह, अल्सर जैसे रोगो के उपचार में और कम वजन तथा पाचन शक्ति को बेहतर बनाने के लिए अधिक लाभकारी है | इसकी जड़ और पौधे दोनों को ही इस्तेमाल में लाया जाता है | इसके पौधों पर पीले रंग के फूल पाए जाते है, तथा दानो का आकार 2 इंच लम्बा और कठोर होता है| यह कम खर्च में अधिक मुनाफा देने वाली फसल है | किसान भाई गुड़मार की खेती कर अधिक लाभ कमा सकते है | यदि आप भी गुड़मार की खेती करने का मन बना रहे है, तो इस लेख में आपको गुड़मार की खेती कैसे करें (Gudmar Plant Information in Hindi) इसके बारे में बताया गया है, तथा इसे मधुनाशिनी का पेड़ भी कहते है |

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गुड़मार की खेती में उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Gudmar Cultivation Suitable Soil, Climate and Temperature)

गुड़मार की खेती किसी भी उपजाऊ मिट्टी में की जा सकती है | बर्फीले क्षेत्रों के अलावा इसकी खेती सभी स्थानों पर की जा सकती है | इसके अलावा जलभराव वाली भूमि में इसकी खेती न करे, क्योकि जलभराव की स्थिति में पैदावार अधिक प्रभावित होती है | इसकी खेती के लिए सामान्य P.H. मान वाली भूमि की जरूरत होती है |

इसके पौधे उष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छे से विकास करते है | गुड़मार का पौधा अधिक गर्मी और सर्दी दोनों ही मौसमो के प्रति सहनशील होता है | किन्तु सर्दियों में अधिक समय तक गिरने वाला पाला पौधों के लिए हानिकारक होता है | भारत के दक्षिणी इलाके में इसकी खेती मुख्य रूप से की जाती है | इसके पौधे अधिकतम 35 डिग्री तथा न्यूनतम 10 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है |

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गुड़मार के खेत की तैयारी और उवर्रक (Gudmar Farm Preparation and Fertilizer)

गुड़मार के पौधों को खेत में लगाने से पहले उसके खेत को रोपाई के लिए तैयार कर लिया जाता है | सबसे पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हलो से गहरी जुताई कर दी जाती है, इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते है | जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है | इसके बाद खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है, जुताई के बाद खेत में पानी लगा दिया जाता है | इसके बाद जब खेत का पानी सूख जाये उस दौरान एक बार फिर से खेत की जुताई कर दी जाती है, इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है | इसके बाद खेत में पाटा लगाकर भूमि को समतल कर दिया जाता है | समतल भूमि में जलभराव की समस्या नहीं देखने को मिलती है |

इसके बाद खेत में पौधों की रोपाई के लिए एक मीटर की दूरी रखते हुए धोरेनुमा समतल भूमि में गड्डो को तैयार कर लिया जाता है | इसके बाद इन गड्डो में जैविक खाद और रासायनिक खाद की उचित मात्रा को मिट्टी में मिलाकर भर दिया जाता है | किन्तु जो किसान टपक सिंचाई के साथ इसकी खेती करना चाहते है, उन्हें पौध रोपाई से 10 से 12 दिन पूर्व गड्डो को तैयार करना होता है |

खेत में गड्डो को तैयार करते समय प्रत्येक गड्डे में जैविक खाद के रूप में 5 KG पुरानी गोबर की खाद के साथ 50 ग्राम एन.पी.के. की मात्रा को रासायनिक खाद के रूप में अच्छे से मिलाकर देना होता है | इसके बाद पौध विकास के दौरान उवर्रक की मात्रा को बढ़ा दिया जाता है | पूर्ण विकसित पौधों को वर्ष में 15 KG जैविक खाद के साथ 250 GM रासायनिक खाद को तीन बार देना होता है |

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गुड़मार के पौधों की रोपाई का सही समय और तरीका (Gudmar Plants Transplanting Right time and Method)

गुड़मार के पौधों की रोपाई बीज और कलम दोनों ही तरीके से की जा सकती है | यदि आप इसके बीजो की रोपाई बीज के रूप में करना चाहते है, तो उसके लिए बीजो को नर्सरी में तैयार कर लिया जाता है | बीजो को लगाने से पहले उन्हें डायथेन एम 4.5 या बाविस्टिन की उचित मात्रा से उपचारित कर ले | नर्सरी में लगाए गए यह बीज पौध रोपाई के लिए 3 से 4 महीने में तैयार हो जाते है | इसके अलावा यदि पौध रोपाई कलम विधि द्वारा करना चाहते है, तो उसके लिए पौधों की शाखाओ को इस्तेमाल में लाया जाता है |

दोनों ही विधियों में पौध रोपाई खेत में तैयार गड्डो और धोरेनुमा नालियों में की जाती है | इसके लिए प्रत्येक गड्डे के मध्य एक मीटर की दूरी रखते हुए उन्हें पंक्तियों में तैयार कर लिया जाता है | इन पंक्तियों के मध्य एक मीटर की दूरी रखी जाती है | गुड़मार के पौधों की रोपाई के लिए जुलाई और अगस्त का महीना सबसे अच्छा माना जाता है | इस दौरान बारिश का महीना होता है, जो पौधों के विकास के लिए उपयुक्त होता है |

गुड़मार के पौधों की सिंचाई (Gudmar Plants Irrigation)

इसके पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | गुड़मार के पौधों की पहली सिंचाई पौध रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है | गर्मी के मौसम में इसके पौधों की सिंचाई 10 से 12 दिन के अंतराल में करनी होती है, तथा सर्दियों के मौसम में 20 से 25 दिन अंतराल में पौधों की सिंचाई की जाती है | इसके पौधों को बारिश के मौसम में जरूरत पड़ने पर ही पानी दे |

गुड़मार के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण (Gudmar Plants Weed Control)

गुड़मार के पौधों को खरपतवार नियंत्रण की अधिक जरूरत होती है | इसकी फसल पर खरपतवार नियंत्रण के लिए प्राकृतिक तरीके का इस्तेमाल किया जाता है | इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के 25 से 30 दिन बाद की जाती है तथा बाद की गुड़ाइयो को एक महीने के अंतराल में करना होता है |

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गुड़मार के पौधों में लगने वाले रोग एवं उपचार (Gudmar Plants Diseases and Treatment)

कीट रोग

गुड़मार के पौधों में लगने वाला यह एक कीट रोग होता है | यह रोग पौधों पर बहुत ही कम देखने को मिलता है | यदि यह कीट रोग गुड़मार में पौधों पर दिखाई दे, तो नीम के तेल या नीम के बीज के आर्क का छिड़काव कर इस रोग से गुड़मार के पौधों को बचाया जा सकता है |

पीली पत्ती रोग

इस क़िस्म का रोग गुड़मार के पौधों पर अक्सर बारिश के मौसम में देखने को मिलता है | इस रोग से प्रभावित पौधे की पत्तिया पीली पड़कर सूखने लगती है, और पौधा विकास करना बंद कर देता है | इस रोग से बचाव के लिए गुड़मार के पौधों की रोपाई के समय प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 10 KG फेरस सल्फेट का छिड़काव करना होता है |

जड़ गलन

यह जड़ गलन रोग गुड़मार के पौधों पर अक्सर खेत में जलभराव की स्थिति में देखने को मिलता है | इस रोग से प्रभावित पौधा पीला पड़कर मुरझाने लगता है, और पौधे का विकास भी पूरी तरह से रुक जाता है | गुड़मार के पौधों को इस रोग से बचाने के लिए खेत में जलभराव की समस्या न होने दे | इसके अलावा जो पौधे इस रोग की चपेट में आ चुके है, उन्हें उखाड़ कर निकला दे, या बोर्डों मिश्रण का छिड़काव पौधों की जड़ो पर करे |

गुड़मार के फसल की कटाई, पैदावार और लाभ (Gudmar Harvesting, Yield and Benefits)

गुड़मार के पौधों को तैयार होने में एक से डेढ़ वर्ष का समय लग जाता है | इसके पौधे आरम्भ में सामान्य पैदावार देते है, तथा पौध विकास के साथ-साथ पैदावार में बढ़ोतरी देखने को मिलती है | गुड़मार का पूर्ण विकसित पौधा वर्ष में दो बार कटाई के लिए तैयार हो जाता है | इसकी पत्तियों के अलावा फलियों की भी तुड़ाई की जाती है | इसकी फलियों को गर्मी के मौसम में फटने से पहले ही तोड़ ले | इसका पूर्ण विकसित पौधा कई वर्षो तक पैदावार दे देता है, इसके अलावा इसकी जड़ो को बेचकर भी कमाई की जा सकती है |

एक वर्ष में इसके पौधे दो बार कटाई के लिए तैयार हो जाते है | जिसमे प्रत्येक पौधे से 4 से 5 KG तक हरी पत्तियों का उत्पादन प्राप्त हो जाता है | एक हेक्टेयर के खेत में तक़रीबन 10 हज़ार तक पौधे लगाए जा सकते है | जिसमे से 40 हज़ार किलो तक पत्तिया प्राप्त हो जाती है | जिनसे 5 क्विंटल सूखी पत्तियों का उत्पादन प्राप्त हो जाता है|इसका बाज़ारी भाव 70 रूपए प्रतिकिलो होता है | इस हिसाब से किसान भाई इसकी एक बार की कटाई से 30 हज़ार तक की कमाई आसानी से कर सकते है |

गुड़मार के फायदे (Gudmar Benefits)

  • गुड़मान का उपयोग अनेक प्रकार की बीमारियों में लाभकारी होता है |
  • यह वजन घटाने और लिपिड कम करने में लाभकारी होता है |
  • गुड़मार में आस्टियोपोरोसिस, माइक्रोबियल संक्रमण, कार्डियोपैथी, हाइपरकोलेस्टेरोलिया, एंटीएलर्जेनिक और एंटीवायरल के गुण पाए जाते है |
  • टाइप 2 डायबिटीज़ वाले मरीजों के लिए गुड़मार काफी लाभदायक होता है |
  • गुड़मार का सेवन रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को नियंत्रित रखता है |
  • गुड़मार में जिमेमिक नाम का एसिड पाया जाता है, जो उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखता है |
  • गुड़मार का सेवन लिवर के लिए टॉनिक का काम करता है, यह पीलिया के इलाज में काफी लाभकारी होता है |

गुड़मार की हानियाँ (Gudmar Disadvantages)

  • गुड़मार ब्लड शुगर को काफी कम कर देता है, इसलिए वह व्यक्ति जो ब्लड शुगर कम करने वाली दवाईयो का सेवन कर रहे है, उन्हें इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए |
  • गुड़मार का अधिक सेवन मतली, चक्कर और सिरदर्द जैसी समस्याएँ पैदा कर सकता है |

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