मुलेठी की खेती कैसे करें | Liquorice Farming in Hindi | मुलेठी की कीमत


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मुलेठी की खेती (Liquorice Farming) से सम्बंधित जानकारी

मुलेठी एक औषधीय फसल मानी जाती है, जिसके पौधे झाड़ीनुमा होते है | मुलेठी को अलग-अलग जगहों पर यष्टिमधु, मुलहठी, अतिमधुरम और इरत्तिमधुरम नाम से भी पुकारा जाता है | अरब देश तुर्किस्तान, ईरान और अफगानिस्तान को मुलेठी का जन्मदाता माना जाता है | इसका पौधा दो मीटर तक लम्बा होता है, जिसमे निकलने वाले बीज भूमि की सतह से कुछ ऊपर निकलते है, किन्तु इसकी जड़ो को अधिक उपयोगी माना जाता है | इसके जड़ो को औषधीय निर्माण के लिए इस्तेमाल में लाते है | मुलेठी स्वाद में मीठी होती है, जिसमे ग्लिसराइजिक एसिड, मुलेठी कैल्शियम, एंटीबायोटिक, एंटी-ऑक्सीडेंट, प्रोटीन और वसा के गुणों की मात्रा भरपूर पायी जाती है |

इसका सेवन करने से कंठ रोग, हृदय रोग, नेत्र रोग, उदर रोग, मुख रोग, सांस विकार रोगो में लाभ प्राप्त होता है | इसके अलावा मुलेठी की जड़े  पित्त, बात, और कफ जैसी बीमारियों में भी लाभकारी होती है | इसकी जड़ो को ताज़ा और सुखाकर इस्तेमाल में लाया जाता है | यदि आप भी मुलेठी की खेती करने का मन बना रहे है, तो इस लेख में आपको मुलेठी की खेती कैसे करें(Liquorice Farming in Hindi) तथा मुलेठी की कीमत के बारे में जानकारी दी जा रही है |

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भारत में मुलेठी की खेती (Liquorice Cultivation in India)

दुनिया के अरब देशो में मुलेठी की उत्पत्ति हुई, किन्तु वर्तमान समय में इसे भारत में भी उगाया जाने लगा है| मुलेठी का पौधा समशीतोष्ण जलवायु वाला होता है, जिसे भारत के सहारनपुर, देहरादून, मसूरी और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में मुख्य रूप से उगाया जाता है|

मुलेठी के फायदे (Liquorice Benefits)

  • गले में होने वाली खरास, जलन, खासी और ब्रोंकाइटिस के उपचार में मुलेठी का उपयोग किया जाता है |
  • मुलेठी का इस्तेमाल अस्थमा को नियंत्रित रखने में लाभकारी होता है |
  • सीरम कोलेस्ट्रॉल और हेपेटिक कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने के लिए भी मुलेठी को लाभकारी माना जाता है |
  • मुलेठी का सेवन मलेरिया के उपचार में भी कर सकते है |
  • झड़ते हुए बालो को रोकने के लिए भी मुलेठी लाभकारी होती है |
  • मुलेठी का सेवन करने से याददाश्त मजबूत होती है |
  • पीलिया के उपचार में भी इसका इस्तेमाल होता रहा है |
  • घातक बीमारी कैंसर में भी मुलेठी का इस्तेमाल किया जा सकता है |

मुलेठी के नुकसान (Liquorice Disadvantages)

  • दो सप्ताह से अधिक समय तक मुलेठी का बड़ी मात्रा में सेवन करने से उच्च रक्तचाप, द्रव प्रतिधारण और चयापचय असमानता जैसी समस्याए हो सकती है |
  • यदि आप हाई बीपी या मूत्रल से संबंधित दवाइयों का सेवन कर रहे है, तो आपको चिकित्सक से परामर्श करके ही इस जड़ी बूटी का सेवन करना होता है |
  • यदि आप गुर्दे की बीमारी, मधुमेह और पोटेशियम का स्तर कम होने से परेशान है, तो आप मुलेठी का सेवन बिलकुल न करे |
  • गर्भवती महिलाओ और बच्चो के लिए मुलेठी का सेवन उपयुक्त नहीं होता है |

मुलेठी की तासीर (Liquorice Effect)

मुलेठी ठंडी तासीर वाली जड़ी-बूटी है, जिस वजह से इसे गर्मियों के मौसम में उपयोग में लाते है | यदि आप ठंडियों में इसका अधिक इस्तेमाल करते है, तो आपको कई तरह की समस्याए भी हो सकती है |

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मुलेठी की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Liquorice Cultivation Suitable soil, Climate and Temperature)

मुलेठी की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थों से युक्त उपजाऊ और रेतीली मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसकी खेती के लिए भूमि उचित जलनिकासी वाली होनी चाहिए | जलभराव वाली भूमि में इसके पौधों को कई तरह के रोग लगने का खतरा होता है | इसके अलावा हल्की क्षारीय भूमि में भी मुलेठी की खेती आसानी से की जा सकती है | 6 से 8.2 के मध्य P.H. मान वाली भूमि को इसकी खेती लिए उचित माना जाता है |

मुलेठी का पौधा उष्ण और समशीतोष्ण दोनों ही तरह की जलवायु वाला होता है | इसके पौधे गर्म जलवायु में अच्छे से विकास करते है, तथा सर्दियों के मौसम में इसके पौधे ठीक से वृद्धि नहीं कर पाते है | इसके पौधों को अधिकतम 50 से 100 CM वर्षा की आवश्यकता होती है | मुलेठी के बीजो को ठीक से अंकुरित होने के लिए 18 से 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है | इसके पौधे अधिकतम 27 डिग्री तथा न्यूनतम 5 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है| इससे अधिक या कम तापमान (Temperature) होने पर पौध वृद्धि पर असर पड़ता है |

मुलेठी की उन्नत किस्में (Liquorice Improved Varieties)

भारत में मुलेठी की बहुत ही कम किस्में मौजूद है, जिस वजह से भारत में अधिकतर मुलेठी का आयात किया जाता है | किन्तु कृषि वैज्ञानिको की मुलेठी के उत्पादन की और रुचि देखने को मिल रही है, जिससे आने वाले समय में इसकी कई उन्नत किस्में देखने को मिल सकती है |

हरियाणा मुलेठी न.1

हरियाणा मुलेठी न.1 किस्म को हिसार के चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया है | यह भारत की पहली उन्नत किस्म है, जिसे भारत में सभी जगह उगाया जा रहा है | इसके पौधों को उत्पादन देने में तीन वर्ष का समय लग जाता है | किन्तु इसकी फसल की गुणवत्ता और उत्पादन की मात्रा अच्छी पायी जाती है |

मुलेठी की इस किस्म में पौधों पर निकलने वाली पत्तियों का आकार लम्बा, चौड़ा और गहरा हरा रंग का होता है, जिसमे अधिक लम्बी जड़े पायी जाती है | इसमें अधिक मात्रा में ग्लिसराइजिक एसिड पाया जाता है |

G. glabra

यह एक विदेशी किस्म है | इस क़िस्म के पौधों को तैयार होने में ढाई वर्ष का समय लग जाता है, जिसमे निकलने वाले पौधे का आकार सामान्य पाया जाता है | यह क़िस्म खासकर चीन, ईरान, इराक और मध्य एशिया में उगाई जाती है, तथा भारत में इसकी जड़ो को आयात किया जाता है | भारत के उत्तरी और पर्वतीय भागो में इस क़िस्म को उगाया जाने लगा है |

मुलेठी के खेत की तैयारी और उवर्रक (Liquorice Field Preparation and Fertilizer)

मुलेठी की फसल उगाने से पहले उसके खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लिया जाता है | इसके लिए सबसे पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हलो से गहरी जुताई कर दी जाती है, इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते है | जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दें, इससे खेत की मिट्टी में सूर्य की धूप ठीक तरह से लग जाती है, और मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट नष्ट हो जाते है | इसके बाद खेत में पहली जुताई के बाद प्राकृतिक खाद के रूप में 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद डालकर कल्टीवेटर लगाकर दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है |

इससे खेत की मिट्टी में गोबर की खाद ठीक तरह से मिल जाती है | खाद को मिट्टी में मिलाने के पश्चात् उसमे पानी लगाकर पलेव कर दिया जाता है, पलेव के बाद खेत की मिट्टी के सूख जाने पर खेत की फिर से जुताई कर दी जाती है, इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है | मिट्टी के भुरभुरा हो जाने के पश्चात् पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है | समतल खेत में जलभराव की समस्या नहीं देखने को मिलती है | औषधीय रूप से की गयी मुलेठी की खेती में जैविक खाद सबसे अच्छी मानी जाती है, किन्तु कुछ किसान भाई को रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहते है, उन्हें आखरी जुताई के समय एक बोरा एन.पी.के. की मात्रा को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़कना होता है |

मुलेठी के बीज की मात्रा एवं उपचार (Licorice Seed Quantity and Treatment)

मुलेठी की खेती में बीज रोपाई के लिए इसकी जड़ो का इस्तेमाल करते है | एक हेक्टेयर के खेत में तक़रीबन 100 से 125 KG मुलेठी जड़ो की आवश्यकता होती है | खरीदी गई जड़े 7 से 9 इंच लम्बी होनी चाहिए | इन जड़ो को रोपाई से पूर्व गोमूत्र से उपचारित कर लिया जाता है, इससे बीज अंकुरण के समय उन्हें किसी तरह का रोग नहीं लगता है |

मुलेठी के बीजो की रोपाई का सही समय और तरीका (Liquorice Seeds Sowing Right time and Method)

मुलेठी के बीजो की रोपाई गर्मी और बरसात के मौसम में करना उपयुक्त माना जाता है | गर्मियों के मौसम में सिंचित जगहों पर इसके बीजो की रोपाई फ़रवरी और मार्च के महीने में की जाती है, तथा असिंचित जगहों पर बीज रोपाई बारिश के मौसम में जुलाई के महीने में की जाती है | मुलेठी के जड़ो की रोपाई समतल और मेड़ दोनों पर ही की जाती है | समतल भूमि में बीज रोपाई के लिए खेत में पंक्तियों को तैयार कर लिया जाता है, तथा प्रत्येक पंक्ति के मध्य तीन फ़ीट की दूरी रखी जाती है |

इन पंक्तियों में पौधों को दो फ़ीट की दूरी पर लगाया जाता है | इसके अलावा यदि आप मेड़ो पर बीजो को लगाते है, तो उसके लिए तीन फ़ीट की दूरी रखते हुए मेड़ तैयार कर ली जाती है, तथा मेड़ पर पौधों को डेढ़ से दो फ़ीट की दूरी पर लगाना होता है | इसके अलावा कंदो की रोपाई 5 से 7 CM की गहराई में की जाती है | इससे बीजो का अंकुरण ठीक तरह से होता है |

मुलेठी के पौधों की सिंचाई (Liquorice Plants Irrigation)

मुलेठी के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | इसकी पहली सिंचाई पौध रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है | इसके बाद बीज अंकुरण के लिए हल्का-हल्का पानी देते रहना होता है, किन्तु बारिश और सर्दियों के मौसम में इसके पौधों को महीने में एक बार ही पानी देना होता है | गर्मियों के मौसम में इसके पौधों की सिंचाई 10 से 15 दिन के अंतराल में करनी चाहिए |

मुलेठी के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण (Liquorice Plants Weed Control)

मुलेठी के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण के लिए प्राकृतिक विधि का इस्तेमाल किया जाता है, चूंकि इसके पौधों को औषधीय रूप में उगाया जाता है, इसलिए खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक विधि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए | आरम्भ में इसके पौधों की गुड़ाई बीज रोपाई के एक माह पश्चात् की जाती है | पहले वर्ष में इसके पौधों को तीन माह के अंतराल में तीन से चार गुड़ाई की आवश्यकता होती है, तथा दूसरे वर्ष में केवल दो से तीन गुड़ाई ही करनी होती है | इसके बाद अंतिम वर्ष में इसके पौधे खुदाई के लिए तैयार हो जाते है, जिस वजह से इन्हे कम गुड़ाई की जरूरत होती है |

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मुलेठी के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Liquorice Plants Diseases and Prevention)

सफ़ेद धब्बा रोग

इस क़िस्म का रोग मुलेठी के पौधों पर जीवाणु के रूप में देखने को मिलता है | इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर आरम्भ में सफ़ेद रंग के धब्बे बन जाते है, तथा रोग के अधिक आक्रामक होने पर धब्बो का आकार बढ़ जाता है, जिससे पौधों को प्रकाश का संश्लेषण करने में दिक्कत होती है, और कुछ समय पश्चात् ही पौधा सूखकर नष्ट हो जाता है | मुलेठी के पौधों को इस रोग से बचाने के लिए नीम के काढ़े या पोटाशियम बाइकार्बोनेट का छिड़काव पौधों पर करना होता है |

हरी सुंडी

हरी सुंडी का रोग मुलेठी के पौधों पर कीट के रूप में आक्रमण करता है | इस रोग का कीट पौधों की पत्तियों के नाजुक अंगो पर आक्रमण करता है | इस कीट रोग की सुंडी पौधे के नाजुक अंगो को खाकर उन्हें पूरी तरह से नष्ट कर देता है| जिससे पौधा ख़राब होकर गिर जाता है | मुलेठी के पौधों को इस रोग से बचाने के लिए नीम के तेल का छिड़काव पौधों पर 10 दिन के  अंतराल में करना होता है |

जड़ गलन

इस क़िस्म का रोग मुलेठी के पौधों पर खेत में अधिक समय तक जलभराव होने की स्थिति में देखने को मिलता है | यदि खेत में जलभराव की समस्या अधिक समय तक रहती है, तो पैदावार भी अधिक प्रभावित होती है | इस रोग से बचाव के लिए भूमि में जलभराव न होने दें |

मुलेठी के पौधों की खुदाई का तरीका (Liquorice Plants Digging Method)

मुलेठी के पौधे बीज रोपाई के तीन वर्ष बाद पैदावार देना आरम्भ कर देते है | तीन वर्ष का समय हो जाने के बाद इसके पौधों की खुदाई कर ले | खुदाई के पहले खेत में पानी लगा दें, इससे खेत की मिट्टी मुलायम हो जाएगी और खुदाई करने में आसानी होगी | पौधों की खुदाई दो से ढाई फ़ीट की गहराई से की जानी चाहिए| खुदाई के लिए किसान भाई हलो का इस्तेमाल कर सकते है |

खुदाई से प्राप्त गाठो को ठीक तरह से धोकर साफ कर लिया जाता है, और उन्हें तेज़ धूप में अच्छे से सूखा लिया जाता है | इसके बाद उन्हें बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है |

मुलेठी की पैदावार और लाभ (Liquorice Production and Benefits)

मुलेठी के पौधों को तैयार होने में तीन वर्ष का समय लग जाता है | इसके एक हेक्टेयर के खेत से तक़रीबन 30 से 35 क्विंटल की पैदावार प्राप्त हो जाती है | मुलेठी का बाज़ारी भाव 130 से 180 रूपए प्रति किलो होता है, जिससे किसान भाई इसकी एक बार की फसल से चार लाख तक की कमाई आसानी से कर सकते है |

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