कढ़ी (करी) पत्ता की खेती कैसे करें | Curry Leaves Farming in Hindi | मीठी नीम के पत्ते कैसे होते हैं

कढ़ी (करी) पत्ता की खेती (Curry Leaves Farming) से सम्बंधित जानकारी

कढ़ी (करी) के पत्तो की खेती मीठी नीम के रूप में की जाती है | इसका पौधा भी कड़वी नीम की भांति होता है | किन्तु नीम की पत्ती की तरह इसकी पत्तियों का किनारा कटा हुआ नहीं होता है | इसका पौधा 15 से 20 फ़ीट ऊँचा होता है | मीठी नीम की केवल पत्तियों को ही उपयोग में लाते है | इसलिए इसके पौधों को केवल 2 मीटर तक ही बढ़ने दिया जाता है | जब इसके पौधों पर फूल आने लगते है, उस दौरान पौधे का विकास रुक जाता है | इसकी पत्तियों को मुख्य रूप से औषधीय के लिए उपयोग में लाते है |

इस वजह से इसे मसाले और औषधीय वाले पौधों की श्रेणी में रखा गया है | इसके पत्तो को सुखाकर उसका पाउडर तैयार कर लिया जाता है, जिसे अधिक समय तक भंडारित कर उपयोग में ला सकते है | इसके पौधों पर छोटे-छोटे सफ़ेद रंग के खुशबूदार फूल निकलते है, जिनमे बनने वाले बीज जहरीले होते है | इन्हे कभी खाना नहीं चाहिए | इसका पूर्ण विकसित पौधा 10 से 15 वर्षो तक पैदावार दे देता है | यदि आप भी कढ़ी की खेती करने का मन बना रहा है, तो इस लेख में आपको कढ़ी (करी) पत्ता की खेती कैसे करें(Curry Leaves Farming in Hindi) तथा मीठी नीम के पत्ते कैसे होते हैं, इसके बारे में जानकारी दी जा रही है |

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कढ़ी पत्ते की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Curry Leaves Cultivation Soil, Climate and Temperature)

कढ़ी की खेती के लिए चिकनी काली उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है | सिंचित जगहों पर इसकी खेती को आसानी से किया जा सकता है | जलभराव वाली भूमि में इसकी खेती को नहीं करना चाहिए | इसकी खेती में भूमि का P.H. मान 6 से 7 के मध्य होना चाहिए |

भारत में इसकी खेती बिहार, बंगाल, उत्तर पूर्वी, केरल और कर्नाटक राज्यों में मुख्य रूप से की जाती है | इसके पौधो को अधिक धूप की आवश्यकता होती है, इस वजह से इसे छायादार जगहों पर नहीं उगाना चाहिए | इसके पौधो को कम वर्षा की आवश्यकता होती है, तथा सर्दियों में गिरने वाला पाला इसके पौधो को अधिक हानि पहुँचाता है | इसके पौधो को अच्छे से वृद्धि करने के लिए सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है | इसके पौधे अधिकतम 40 डिग्री तथा न्यूनतम 10 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है |

कढ़ी के खेत की तैयारी और उवर्रक (Curry Field Preparation and Fertilizers)

कढ़ी का पूर्ण विकसित पौधा 10 से 15 वर्षो तक पैदावार देता है, इसलिए इसके खेत को अच्छे से तैयार कर लेना चाहिए | इसके लिए सबसे पहले खेत की गहरी जुताई कर खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष को पूरी तरह से नष्ट कर उन्हें निकाल दिया जाता है | इसके बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दे | इससे खेत की मिट्टी में अच्छे से धूप लग जाती है, और मिट्टी में मोजूद हानिकारक कीट नष्ट हो जाते है |

खेत की पहली जुताई के बाद उसमे तक़रीबन 200 क्विंटल पुरानी गोबर की खाद को डालकर कल्टीवेटर के माध्यम से दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है | इससे खेत की मिट्टी में गोबर की खाद अच्छे से मिल जाती है | गोबर की खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी लगाकर पलेव कर दिया जाता है, पलेव के बाद जब खेत की मिट्टी ऊपर से सूखी दिखाई देने लगे, उस दोरान रोटावेटर लगाकर खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दे | इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है,मिट्टी के भुरभुरा हो जाने के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है |

इसके बाद खेत में तीन से चार मीटर की दूरी रखते हुए गड्डो को तैयार कर लिया जाता है | इन गड्डो को पंक्ति के रूप में तैयार किया जाता है, तथा प्रत्येक पंक्ति के बीच सामान्य दूरी रखी जाती है | यदि आप चाहे तो प्राकृतिक खाद के स्थान पर जैविक खाद का भी इस्तेमाल कर सकते है | इन गड्डो को रोपाई के 15 दिन पहले मिट्टी में खाद मिलाकर तैयार कर लिया जाता है | इसके बाद जब पौधे तीन महीने के हो जाए उस दौरान इसमें जैविक खाद की दो से तीन किलो की मात्रा को पौधो को देना होता है |

कढ़ी के बीजो की रोपाई का सही समय और तरीका (Curry Seeds Sowing Right time and Method)

कढ़ी के बीजो की रोपाई बीज के रूप में की जाती है | इसके अलावा इसे कलम के माध्यम से भी लगाया जा सकता है,किन्तु किसान भाई बीज के माध्यम से रोपाई करना अधिक पसंद करते है | एक एकड़ के खेत में तक़रीबन 70 KG बीजो की आवश्यकता होती है | बीजो की रोपाई खेत में 3 से 4 मीटर की दूरी पर तैयार गड्डो में की जाती है | बीज रोपाई से पहले उन्हें दो से तीन घंटे तक गोमूत्र में रखकर उपचारित कर लिया जाता है | इसके बाद बीजो को गड्डो में 3 से 4 CM की गहराई में गाड़ा जाता है |

एक गड्डे में दो से तीन बीज गाड़ने चाहिए | कढ़ी के बीजो की रोपाई के लिए मार्च का महीना सबसे अच्छा माना जाता है| मार्च में लगाए गए पौधे 7 महीने बाद सितम्बर से अक्टूबर के महीने में कटाई के लिए तैयार हो जाते है | पहली कटाई के पश्चात् हर 3 महीने में इसके पौधों की कटाई कर सकते है |

कढ़ी के पौधों की सिंचाई (Curry Plants Irrigation)

कढ़ी के पौधों की पहली सिंचाई बीज रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है | इसके बाद जब बीजो का अंकुरण होने लगे उस दौरान गड्डो में नमी की जरूरत होती है, इसके लिए दो से तीन दिन में पानी लगाते रहना चाहिए | इसके बाद जब बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप ले लें, तब इन्हे सप्ताह में एक बार पानी देना होता है | बारिश के मौसम में यदि समय से बारिश हो रही है, तो इन्हे सामान्य सिंचाई की आवश्यकता होती है, तथा सर्दियों के मौसम में जरूरत पड़ने पर ही पानी दे |

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कढ़ी के पौधों में खरपतवार नियंत्रण (Curry Plants Weed Control)

कढ़ी के पौधों में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए निराई – गुड़ाई विधि का इस्तेमाल किया जाता है | इसके पौधों को चार से पांच गुड़ाई की ही आवश्यकता होती है | इसकी पहली गुड़ाई बीज रोपाई के एक माह बाद की जाती है, तथा दूसरी गुड़ाई को दो माह बाद करना होता है | बाकि की गुड़ाई प्रत्येक गुड़ाई के एक माह बाद की जाती है |

कढ़ी के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Curry Plants Diseases and Prevention)

कढ़ी के पत्तो की कटाई हर तीन माह पश्चात् की जाती है | इसलिए इसके पौधों में बहुत ही कम रोग देखने को मिलते है | किन्तु कुछ रोग ऐसे होते है, जो पौधों पर आक्रमण कर उन्हें हानि पहुंचाते है |

कीटों का आक्रमण

इस किस्म का रोग पौधों पर कीट के रूप में आक्रमण करता है, यह रोग अक्सर जलवायु परिवर्तन के कारण देखने को मिलता है | इस कीट का लार्वा पत्तियों पर आक्रमण कर उन्हें हानि पहुँचाता है | इसके पत्तियों को व्यापारिक रूप से इस्तेमाल में लाया जाता है | इसके पौधों को रोग से बचाने के लिए नीम के तेल का छिड़काव किया जाता है |

जड़ गलन

इस किस्म का रोग कढ़ी के पौधों पर अक्सर जल भराव की स्थिति में देखने को मिलता है | इस रोग के लग जाने से पौधे की पत्तिया पीली पड़ जाती है, जिसके कुछ समय पश्चात् ही पौधा नष्ट हो जाता है | इस रोग से बचाव के लिए कढ़ी के पौधों की जड़ के पास जल भराव न होने दे | इसके अतिरिक्त ट्राइकोडर्मा का उचित छिड़काव पौधों की जड़ो पर किया जाता है |

दीमक का रोग

यह दीमक रोग पौधों की जड़ो पर आक्रमण कर उन्हें हानि पहुँचाता है | यह मिट्टी के अंदर से आक्रमण करता है | इस रोग से प्रभावित पौधा आरम्भ में मुरझाने लगता है, तथा रोग से अधिक प्रभावित होने पर पौधा पूरी तरह से सूखकर नष्ट हो जाता है | इस रोग से पौधों को बचाने के लिए क्लोरोपाइरीफास की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर किया जाता है |

कढ़ी के पत्तो की कटाई, पैदावार और लाभ (Curry Leaves Harvesting, Yield and Benefits)

कढ़ी के पौधे बीज रोपाई के सात महीने बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते है | इसके पौधों की पहली कटाई आधा फ़ीट ऊंचाई से की जाती है | पहली कटाई के तीन महीने बाद इसके पत्ते फिर से कटाई के लिए तैयार हो जाते है | इसके पौधों पर फूल बनने से पहले उन्हें काट लिया जाता है, क्योकि फूल बनने से पौधे की वृद्धि रुक जाती है | पत्तियों की कटाई के बाद उन्हें एकत्रित कर छायादार जगह पर सूखा लिया जाता है |

पत्तियों को ठीक तरह से सूखाने के बाद उसका चूर्ण बनाकर या फिर ऐसे ही बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है | इसके पौधे की कटाई एक वर्ष में चार बार की जा सकती है | एक एकड़ के खेत में तक़रीबन तीन से चार टन की पैदावार प्राप्त हो जाती है | जिससे किसान भाई इसकी एक बार की फसल से एक लाख तक की कमाई आसानी से कर सकते है |

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