बाजरे की खेती कैसे करे | Bajre Ki Kheti Kab Ki Jaati Hai – उन्नत तरीका


बाजरे (Millet) की खेती से सम्बंधित जानकारी

बाजरे की खेती खरीफ के मौसम में की जाती है | यह मोटे दाने वाली फसल है | बाजरे के अधिक उत्पादन के लिए खेती में उन्नत प्रौद्योगिकियां अपनाना जरूरी होता है | भारत बाजरा उत्पादन में विश्व का अग्रणी देश है | भारत के तक़रीबन 85 लाख हेक्टेयर के क्षेत्रफल में बाजरे की फसल उगाई जाती है | जिसमे से 87 प्रतिशत का क्षेत्रफल महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश राज्यों से आता है | शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में बाजरा एक प्रमुख खाद्य फसल है | इसके अलावा बाजरे को पशुओ के लिए पौष्टिक चारा उत्पादन के लिए भी उगाया जाता है | पोषण की दृष्टि से बाजरे के दानो में अधिक प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट, केरोटीन, कैल्शियम, खनिज तत्व, राइबोफ्लेविन (विटामिन B-2) और विटामिन बी-6 की प्रचुर मात्रा पाई जाती है |

गेंहू व चावल की तुलना में बाजरे में आयरन भी अधिक होता है | अधिक ऊर्जा होने की वजह से बाजरे को सर्दियों के मौसम में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है | बाजरे के चारे में कैल्शियम फास्फोरस, प्रोटीन, हाइड्रोरासायनिक अम्ल और खनिज लवण सुरक्षित मात्रा में पाया जाता है, जो कि पशुओ को चारे के रूप में देना काफी लाभकारी होता है | बाजरे की फसल में कीट एवं रोग पर प्रबंधन कर उत्पादन अधिक मात्रा में लिया जा सकता है | यहाँ पर आपको बाजरे की खेती कैसे करे तथा Bajre Ki Kheti Kab Ki Jaati Hai और बाजरे की खेती करने का उन्नत तरीका क्या है, की जानकारी दे रहे है |

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बाजरे की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी (Millet Cultivation Suitable Soil)

बाजरे की खेती के लिए रेतीली बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है, किन्तु अब बाजरे की खेती को किसी भी तरह की भूमि में किया जाने लगा है | इसके लिए बस आप यह ध्यान रखे की मिट्टी में पानी अधिक समय तक भरा न रहने दे | क्योकि ज्यादा दिन तक पानी भरा रहने की वजह से पौधों को रोग लग जाते है, जिसका प्रभाव पैदावार पर पड़ता है |

बाजरा खाने के फायदे (Millet Eating Benefits)

  • बाजरे में काफी एनर्जी होती है, जिस वजह से यह ऊर्जा का एक अच्छा स्त्रोत भी है | बाजरा शरीर में एनर्जी को उत्पन्न करता है | यदि आप अपने वजन को घटाना चाहते है, तो बाजरा खाना आपके लिए काफी फायदेमंद हो सकता है | क्योकि बाजरा खाने के बाद देर तक पेट भरा हुआ महसूस होता है, जिस वजह से बार-बार भूख नहीं लगती है, और इस वजह से भूख कंट्रोल में रहता है |
  • बाजरा कोलेस्ट्रॉल के लेवेल को भी नियंत्रित करता है, जिससे दिल से जुड़ी बीमारी होने का खतरा काफी हो जाता है | बाजरा मैग्नीशियम और पोटैशियम का काफी अच्छा स्त्रोत है, जिस वजह से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है |
  • बाजरे में फाइबर की मात्रा काफी अच्छी होती है, जो पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने में सहायता करता है | बाजरे का सेवन करने से कब्ज की समस्या नहीं होती है, और भोजन भी ठीक तरह से पचता है | यदि आप पाचन की समस्या से जूझ रहे है, तो बाजरे का सेवन करना आपके लिए लाभकारी साबित हो सकता है |

बाजरे की खेती के लिए जलवायु और तापमान (Bajra Cultivation Climate and Temperature)

बाजरे की खेती को शुष्क और अर्धशुष्क जलवायु वाली भूमि में कर सकते है | वर्षा ऋतु का मौसम शुरू होते ही बाजरे को खेतो में ऊगा देना चाहिए, तथा शरद ऋतु से पहले फसल की कटाई कर ली जाती है | बाजरे की उन्नत खेती के लिए 400 से 600 ML बारिश की जरूरत होती है | पौधों पर सिट्टे आने के दौरान उन्हें नमी की जरूरत होती है | ऐसे समय अगर बारिश नहीं होती है, तो दाना कमजोर हो जाता है |

बाजरे के पौधों को अंकुरण के लिए 25 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि पौध विकास के लिए 30 से 35 डिग्री का तापमान चाहिए होता है | लेकिन 40 डिग्री तापमान पर भी बाजरे का पौधा अच्छी पैदावार दे देता है |

बाजरे की उन्नत किस्में (Millet Improved Varieties)

  • एचएचबी 299 :- यह बाजरे की एक संकर किस्म है, जिसे चारे की आपूर्ति के लिए उगाया जाता है | इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 से 35 क्विंटल अनाज और तक़रीबन 70 क्विंटल चारा होता है | बाजरे की यह क़िस्म बुवाई के 80 दिन पश्चात् उत्पादन देने लगती है |
  • रेवती 2123 :- इस क़िस्म को पकने में 85 दिन का समय लगता है | बाजरे का यह पौधा अधिक फुटाव लेता है | प्रति हेक्टेयर में रेवती 2123 क़िस्म से अनाज उत्पादन 30 क्विंटल तथा चारा 80 क्विंटल से अधिक मिल जाता है |
  • हाइब्रिड पूसा 415 :- इस क़िस्म के बाजरे के सिट्टे की लंबाई 30 CM से भी अधिक होती है | इसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 25 से 30 क्विंटल होता है, तथा फसल को पकने में 75 दिन का समय लगता है | हाइब्रिड पूरा 415 को उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में काफी ज्यादा उगाया जाता है |
  • एम एच 143 :- एम एच 143 बाजरा क़िस्म को तैयार होने में 70 से 80 दिन का समय लगता है, जिसमे प्रति हेक्टेयर का उत्पादन 50 क्विंटल अनाज और 80 क्विंटल तक सूखा चारा मिल जाता है |
  • एएचबी 1200 :- यह बाजरे की एक संकर क़िस्म है, जो बुवाई से 78 दिनों में पककर तैयार हो जाती है | इस क़िस्म का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 35 क्विंटल अनाज और 70 क्विंटल सूखा चारा होता है |

इसके अलावा भी कई किस्में है, जिन्हे अलग-अलग प्रदेशो में बड़ी मात्रा में उगाते है | इसमें पूसा 322, सी जेड पी 9802, जी एच बी 719, राज 171, नंदी- 70, और एच एच बी 67-2 किस्में शामिल है |

बाजरे के खेत की तैयारी (Millet Field Preparation)

बाजरे की फसल लगाने से पहले खेत को अधिक जुताई की जरूरत नहीं होती है | खेत को आरंभ में सिर्फ 2 जुताई की जरूरत होती है, और कुछ मात्रा में गोबर खाद को डालना होता है | इसके बाद खेत की फिर से जुताई कर दे, और अगर बारिश हुई हो तो भी एक बार जुताई कर खेत में बीजो को लगा दें |

बाजरे की बुवाई का समय और तरीका (Bajra Sowing Time and Method)

बाजरे के बीजो की बुवाई पहली बारिश के साथ ही खेतो में कर देनी चाहिए, यदि बारिश समय से न हो तो खेत में पानी लगाकर बुवाई कर दें | बाजरे की बुवाई के लिए मई से जून का महीने सबसे अच्छा होता है | बाजरे की बुवाई के लिए दो तरीको को अपनाया जा सकता है, पहले तरीके में आप बाजरे के बीजो को खेत में छिड़ककर हल्की जुताई कर मिट्टी में मिलाया जाता है, जुताई इस हिसाब से करे की बीज ज्यादा गहराई में जाकर 2 से 3 CM गहराई में जाने चाहिए |

बुवाई के दूसरे तरीके में बीजो को मशीन द्वारा बोया जाता है| इसमें बीजो को कतारों में लगाया जाता है, तथा प्रत्येक कतार के मध्य आधा फ़ीट की दूरी रखे, और दानो को 8 से 10 CM की दूरी पर लगाए | इस तरीके में भी बीजो को सिर्फ 2 CM की गहराई में ही लगाए | एक बीघा के खेत में बाजरे की बुवाई के लिए एक से सवा किलो बीजो की जरूरत होती है |

बाजरे की सिंचाई (Millet Irrigation)

बाजरे की खेती में अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | क्योकि इसकी पूरी फसल बारिश के मौसम पर निर्भर होती है, किन्तु बाजरे की फसल बुवाई के बाद अगर बारिश लंबे समय तक न हो तो फसल सूखने लगेगी, ऐसे सिंचाई करना जरूरी होता है | इसके बाद भी यदि बारिश की समस्या बनी रहती है, तो आवश्यकतानुसार सिंचाई करे | अगर आप बाजरे को सिर्फ हरे चारे के लिए ऊगा रहे है, तो सप्ताह में दो से तीन बार पानी दें, इससे पौधों में पानी की उचित मात्रा बनी रहती है, और पशुओ को खाने के लिए अच्छा चारा मिल जाता है |

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बाजरे के खेत में उर्वरक की मात्रा (Millet Field Fertilizer Amount)

बाजरे की फसल को अधिक उवर्रक की जरूरत नहीं होती है | इसमें आपको फसल बुवाई से पहले सिर्फ 10 गाड़ी सड़ी गोबर की खाद को प्रति एकड़ के खेत में देना होता है | इसके अलावा बुवाई से पूर्व एन.पी.के. की उचित मात्रा को भी खेत में डाले | इसके बाद नाइट्रोजन की 20 KG की मात्रा का छिड़काव एक से डेढ़ माह बाद करे | कई जगहों पर एन. पी. के. की डी.ए.पी. का भी इस्तेमाल किया जाता है | जिन जगहों पर डी.ए.पी. का उपयोग करते है, वहां डेढ़ महीने बाद यूरिया की 20 से 25 KG की मात्रा को प्रति एकड़ के खेत में डालें | अगर बाजरे की बुवाई हरे चारे के लिए की गयी है, तो प्रत्येक कटाई के पश्चात् पौधों को हल्का-हल्का उवर्रक दें, ताकि पौधे अच्छे से वृद्धि करते रहे |

बाजरे के पौधों की निराई-गुड़ाई (Millet Plants Weeding)

बाजरे की फसल को खास निराई-गुड़ाई की जरूरत नहीं होती है, लेकिन फिर भी यदि गुड़ाई की जाए तो पौधों की वृद्धि काफी अच्छी होगी | जिसका असर पैदावार पर देखने को मिलेगा | यदि खेत में अधिक खरपतवार दिखाई दें तो खरपतवार नाशक दवाइयों का छिड़काव करे | इसके लिए एट्राजिन का इस्तेमाल करना बेहतर होता है |

बाजरे की फसल में लगने वाले रोग व उपचार (Bajra Crop Diseases and Treatment)

  • दीमक और सफेद लट :- यह दोनों ही कीट पौधे की जड़ो पर आक्रमण कर उन्हें हानि पहुंचाते है | यह कीट पौधे की जड़ को काट देता है, और पौधा सूखकर पूरी तरह से नष्ट हो जाता है | इस तरह के कीट से बचाव के लिए बाजरे के पौधों की जड़ो पर क्लोरोपाइरीफॉस का छिड़काव बारिश के मौसम में किया जाता है | इसके अलावा बीज बुवाई से पहले खेत में 1-2 KG फॉरेट का छिड़काव करे |
  • टिड्डियों का आक्रमण :- टिड्डियों का आक्रमण अक्सर पौधे पर उनके बड़े होने की अवस्था में देखने को मिलता है | यह टिड्डिया पौधे की सभी पत्तियों को खाकर नष्ट कर देती है, जिस वजह से पैदावार काफी कम बचती है | फसल को टिड्डियों के आक्रमण से बचाने के लिए खेत में फॉरेट का हल्का छिड़काव करे |
  • मृदु रोमिल आसिता रोग :- बाजरे की फसल में इस तरह का रोग काफी कम देखने को मिलता है | यह रोग पौधे पर फफूंद की वजह से लगता है | फफूंद लगने की वजह से पौधा पीला पड़ने लगता है, और पौधे की वृद्धि रुक जाती है | इसके अलावा पौधे की निचली पत्तियों पर सफ़ेद रंग का पाउडर बनने लगता है | इसकी रोकथाम के लिए खेत में बीजो को बोने से पहले उन रिडोमिल एम जेड- 72 से उपचारित करे और प्रमाणित बीजो को ही खेत में लगाए |
  • अर्गट :- अर्गत एक सामान्य रोग है, जो बाजरे की फसल पर देखने को मिल ही जाता है | किन्तु आज के समय में कई ऐसी किस्में है, जिन पर इस तरह का रोग नहीं देखने को मिलता है | इस तरह का रोग पौधों पर सिट्टे आने के दौरान लगता है | इस रोग से प्रभावित होने पर बाजरे के सिट्टे पर चिपचिपा पदार्थ बनने लगता है, और कुछ समय में सुखकर गाढ़ा होता है | यह मनुष्य और पशु दोनों के लिए ही हानिकारक होता है | इसकी रोकथाम के लिए प्रमाणित बीजो को ही खेत में लगाए तथा फसल की अगेती बुवाई करे |

बाजरे के फसल की कटाई, पैदावार और लाभ (Bajra Crop Harvesting, Yield and Benefits)

बाजरे की फसल को तैयार होने में 70 से 80 दिन का समय लग जाता है | जब बाजरे का दाना कठोर हो जाए और भूरा दिखाई देने लगे तब फसल की कटाई कर ले | बाजरे के पौधों की कटाई दो बार करते है, पहली कटाई में पौधों को काटते है, और दूसरी कटाई में सिट्टे को काटकर अलग करते है | किसान भाई एक हेक्टेयर के खेत में बाजरे की खेती कर 25 से 30 क्विंटल अनाज की पैदावार ले सकते है, वही 70 क्विंटल तक सूखा चारा मिल जाता है| इस तरह से किसान भाइयो की बाजरे की फसल से अच्छी कमाई हो जाती है |

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