खीरे की खेती कैसे करें | Cucumber Farming in Hindi | खीरे की खेती से कमाई


खीरे की खेती (Cucumber Farming) से सम्बंधित जानकारी

खीरे की खेती कच्ची सब्जी के रूप में की जाती है | सभी सब्जियों में खीरे का एक महत्वपूर्ण स्थान है | खाने में सलाद के रूप में इसका अधिक इस्तेमाल किया जाता है | खीरे में सबसे अधिक पानी की मात्रा पाई जाती है | गर्मियों के मौसम में खीरे का सेवन करने के शरीर में पानी की कमी नहीं होती है | खीरे का सेवन कर पेट संबधित बीमारियो, दर्द और पथरी के रोग से छुटकारा पाया जा सकता है | इसे खाने के अलावा सौन्दर्य प्रसाधन की चीज़ो को बनाने के लिए भी उपयोग में लाते है |

खीरे की फसल तीन महीने में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाती है, तथा इसकी खेती किसी भी भूमि में की जा सकती है, जिससे किसान भाइयो को खीरे की खेती करने में काफी आसानी होती है | यदि आप भी खीरे की खेती करने का मन बना रहे है, तो इस लेख में आपको खीरे की खेती कैसे करें (Cucumber Farming in Hindi) तथा खीरे की खेती से कमाई के बारे में जानकारी दी जा रही है |

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खीरे की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Cucumber Cultivation Suitable soil, Climate and Temperature)

खीरे की खेती किसी भी उपजाऊ भूमि में की जा सकती है, किन्तु बलुई दोमट मिट्टी में इसकी खेती कर अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है | इसकी खेती के लिए भूमि का P.H. मान 6 से 7 के मध्य होना चाहिए | शीतोष्ण और समशीतोष्ण जलवायु को खीरे की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है | भारत में इसे अधिकतर बारिश और गर्मियों के मौसम में उगाया जाता है |

इसके अलावा सर्दियों के मौसम में गिरने वाला पाला भी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होता है | खीरे की अच्छी फसल के लिए सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है | इसकी फसल अधिकतम 40 डिग्री तथा न्यूनतम 20 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकती है |

खीरे की उन्नत किस्में (Cucumber Improved Varieties)

स्वर्ण पूर्णिमा

खीरे की यह किस्म कम समय में पैदावार देने के लिए उगाई जाती है | इसकी फसल 45 दिनों में पककर तैयार हो जाती है | जब इसके पौधों पर फल निकलना आरम्भ कर देते है, तब उसके कुछ दिन बाद ही फलो की तुड़ाई कर ली जाती है | इस क़िस्म के पौधे प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 200 से 250 क्विंटल की पैदावार दे देते है |

कल्याणपुर ग्रीन

खीरे की यह क़िस्म सबसे अधिक और कम समय में पैदावार देने के लिए जानी जाती है | इस क़िस्म के पौधों में 40 दिन बाद फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है | जब इसके पौधों में फल आना शुरू कर देते है तब इसके फलो की तुड़ाई रोज करना आरम्भ कर दे | खीरे की इस क़िस्म में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 10 से 15 टन की पैदावार प्राप्त हो जाती है |

हिमांगनी

हिमांगनी क़िस्म के पौधों को तैयार होने में 40 से 45 दिन का समय लग जाता है,जिसके फलो के तैयार हो जाने पर रोज तुड़ाई की जरूरत होती है | यह क़िस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 10 से 12 टन की पैदावार देती है |

खीरा -75

इस क़िस्म को खासकर पर्वतीय स्थानों में उगाया जाता है | जिसे तैयार होने में 45 से 50 दिन का समय लग जाता है | इसके फलो की तुड़ाई दो दिन के अंतराल में की जाती है | यह क़िस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 8 टन की पैदावार दे देती है | इसके अलावा प्रिया, स्वर्ण शीतल, पूसा उदय, स्ट्रेट 8 भी कुछ ऐसी उन्नत किस्में है, जिन्हे अधिक पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है |

खीरे के खेत की जुताई और उवर्रक की मात्रा (Cucumber Field Tillage and Fertilizer)

खीरे की फसल करने से पहले खेत को तैयार करने के लिए उसकी अच्छे से गहरी जुताई कर दी जाती है | इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते है | इसके बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है | खेत में बीज रोपाई से पहले प्राकृतिक खाद के रूप में 20 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को डालकर रोटावेटर से जुताई कर मिट्टी में खाद को अच्छे से मिला दिया जाता है |

खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी लगा दिया जाता है | इसके बाद खेत की मिट्टी के सूखी दिखाई देने पर एक बार फिर से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा कर दिया जाता है | खीरे के बीजो की रोपाई मेड़ पर की जाती है | इसलिए खेत में मेड़ को तैयार कर मेड़ में बीच में एन.पी.के. की उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता है | इसके अलावा खेत में पौधों को लगाने के 30 दिन पश्चात् बाद एक एकड़ के  खेत में 20 KG नाइट्रोजन की मात्रा का छिड़काव करे, तथा उसके 40 दिन बाद फिर से 20 KG नाइट्रोजन का छिड़काव कर दे, इससे पैदावार अच्छी प्राप्त होती है |

खीरे के बीजो की रोपाई का सही समय और तरीका (Cucumber Seeds Planting Right time and Method)

खीरे की फसल अलग-अलग जलवायु के हिसाब से अलग-अलग समय पर की जाती है | भारत के उत्तरी क्षेत्रों में इसे मार्च से नवंबर के माह में उगाया जाता है, तथा दक्षिण भारत में इसे केवल नवंबर के माह में लगाया जाता है | इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी खेती के लिए अप्रैल और मई का महीना उचित माना जाता है |

खीरे के बीजो की रोपाई खेत में तैयार की गई मेड़ पर की जाती है | इसके लिए खेत में चार फ़ीट की दूरी रखते हुए एक से सवा फ़ीट चौड़ी मेड़ को तैयार कर लिया जाता है | इन मेड़ो पर बीजो की रोपाई दो से तीन फ़ीट की दूरी पर की जाती है | इसके अतिरिक्त यदि किसान भाई बीजो की रोपाई समतल खेत में करना चाहते है, तो उसके लिए खेत में एक फ़ीट गहरी नालियों को तैयार कर लिया जाता है | इसके बाद इन नालियों में एक फ़ीट की दूरी पर बीजो को लगाया जाता है | खीरे की साधारण क़िस्म में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 3 KG बीज तथा संकर क़िस्म में 2 KG बीजो की आवश्यकता होती है |

खीरे के पौधों की सिंचाई (Cucumber Plants Irrigation)

खीरे के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | इसके पौधों को केवल तीन से चार सिंचाई की आवश्यकता होती है | गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को 10 से 15 दिन के अंतराल में पानी की आवश्यकता होती है | बारिश के मौसम में इसके पौधों की सिंचाई जरूरत पड़ने पर ही की जाती है, तथा सर्दियों के मौसम में इसे हफ्ते में एक बार पानी देना होता है | खीरे के पौधों की सिंचाई के लिए ड्रिप विधि का इस्तेमाल अच्छा माना जाता है |

खीरे के पौधों में खरपतवार नियंत्रण (Cucumber Plant Weed Control)

खीरे की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्राकृतिक विधि का इस्तेमाल किया जाता है | इसके पौधों को केवल दो से तीन गुड़ाई की ही आवश्यकता होती है | इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के 25 दिन बाद और दूसरी गुड़ाई लगभग 20 दिन बाद की जाती है |

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खीरे के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Cucumber Plant Diseases and Their Prevention)

चूर्णी फफूंदी

खीरे के पौधों में लगने वाला यह रोग एक महीने पश्चात् ही दिखाई देने लगता है | इस रोग से प्रभावित होने पर पौधों की पत्तियों की निचली सतह पर सफ़ेद रंग के धब्बे पड़ जाते है | यह रोग पौधों की पत्तियों को नष्ट कर देता है, जिससे पैदावार भी प्रभावित होती है | इस रोग की रोकथाम के लिए सल्फेक्स और कैराथेन की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों की पत्तियों पर किया जाता है |

फल मक्खी

इस क़िस्म का रोग पौधों पर कीट के रूप में आक्रमण करता है | यह रोग पौधे पर लगे कच्चे और पक्के फल दोनों को ही ख़राब कर देता है, जिससे पैदावार भी अधिक प्रभावित होती है | कारटप एस पी की उचित मात्रा का छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है |

सुंडी रोग

यह सुंडी रोग पौधों की पत्तियों को प्रभावित करता है | इस रोग की सुंडी पत्तियों को खाकर उन्हें पूरी तरह से नष्ट कर देती है | इस रोग से प्रभावित पौधे अच्छे से वृद्धि नहीं कर पाते है | इस रोग का कीड़ा हरा और पीले रंग का होता है | इस रोग की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर किया जाता है |

आद्र या बीज गलन रोग

इस तरह का रोग अक्सर जलभराव की स्थिति में देखने को मिलता है | इस रोग में बीज सड़कर ख़राब हो जाता है, जिससे बीज अंकुरण नहीं कर पाता है | इस रोग से बचाव के लिए मैन्कोजेब की उचित मात्रा से उपचारित कर बीजो की रोपाई करनी चाहिए |

खीरे की खेती से कमाई और पैदावार (Cucumber Fruit Harvesting, Yield and Benefits)

खीरे की फसल बीज रोपाई के 40 से 45 दिन बाद पैदावार देना आरम्भ कर देती है | जब इसके पौधों में लगे फल आकर्षण दिखाई देने लगे तब उनकी तुड़ाई कर ली जाती है, किस्मो के आधार पर इसके फलो की तुड़ाई एक से दो दिन के अंतराल में कई बार की जाती है | अलग-अलग क़िस्म के आधार पर खीरे की फसल से 4 से 16 टन की पैदावार प्राप्त हो जाती है | खीरे का बाज़ारी भाव 1500 से 2000 रूपए प्रति क्विंटल होता है, जिससे किसान भाई खीरे की एक बार की फसल से 1 लाख से अधिक की कमाई कर अच्छा लाभ कमा सकते है |

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