नारियल की खेती कैसे होती है | Coconut Farming in Hindi | नारियल का भाव

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नारियल की खेती (Coconut Farming) से सम्बंधित जानकारी

नारियल का पेड़ अधिक समय तक फल देने के लिए जाना जाता है | इसका एक पेड़ 80 वर्षो से अधिक समय तक हरा बना रहता है | इसे स्वर्ग का पौधा भी कहते है | हिन्दू धर्म के धार्मिक अनुष्ठानों में नारियल के फल को उपयोग में लाया जाता है | इसका पेड़ 10 मीटर से भी अधिक लम्बा होता है | नारियल के पौधों में लगे तने पत्ती और शाखा रहित होते है | कच्चे नारियल के फल से उसमे से पानी को निकालकर पीने के लिए उपयोग में लाते है, तथा उसके गूदे को ऐसे ही खाया जाता है | इसके अलावा पके हुए नारियल से तेल निकाला जाता है, तथा इसके तेल को खाने के अलावा शरीर में लगाने और दवाइयों में भी उपयोग करते है |

इसके फल में जिंक की मात्रा अधिक पाई जाती है, जिस वजह से इसका सेवन कर मोटापे से छुटकारा पाया जा सकता है | यह त्वचा संबंधी रोगो के लिए भी काफी लाभकारी होता है, साथ ही इसके इस्तेमाल से जलन, सर्दी जुकाम और डायरिया की बीमारी से भी छुटकारा पाया जा सकता है | भारत में नारियल की खेती को गोवा, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और समुद्रीय तटीय इलाको में की जाती है | यदि आप भी नारियल की खेती करना चाहते है, तो इस लेख में आपको नारियल की खेती कैसे होती है (Coconut Farming in Hindi) तथा नारियल का भाव से जुड़ी जानकारी दी जा रही है |

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नारियल की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान (Coconut Cultivation Suitable Soil, Climate and Temperature)

नारियल की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसकी खेती पथरीली भूमि में नहीं की जा सकती है | नारियल के पेड़ की जड़े भूमि में अधिक गहराई तक पाई जाती है | इसलिए कठोर भूमि में इसकी खेती को नहीं करना चाहिए | 5.2 से 8.8 के मध्य P.H. मान वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है |

नारियल का पौधा उष्ण और उपोष्ण जलवायु वाला होता है, इसलिए इसकी खेती में हवा की सापेक्ष आद्रता वाली जलवायु की आवश्यकता होती है | इसे न्यूनतम 60% आद्रता वाली हवा की जरूरत होती है | गर्म मौसम में नारियल के फल अच्छी तरह से पक जाते है | नारियल के पेड़ो को अच्छे से विकास करने के लिए सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है, इसके पौधे अधिकतम 40 डिग्री तथा न्यूनतम 10 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है |

नारियल की उन्नत किस्में (Coconut Improved Varieties)

लम्बी प्रजाति

नारियल की इस क़िस्म को गैर-परम्परागत क्षेत्रों में उगाने के लिए तैयार किया गया है | इस क़िस्म के पौधों को कम सिंचाई की आवश्यकता होती है, तथा इसमें निकलने वाला पौधा अधिक ऊंचाई का होता है, जो अन्य प्रजातियों की तुलना में अधिक समय तक फल देता है | नारियल की यह क़िस्म मुख्य रूप से तटीय और पश्चिम तटीय क्षेत्रों में उगाई जाती है | इसके अलावा वेस्ट कोस्ट, लक्षद्वीप मीडियम, कैतताली, कोचीन चाइना, अंडमान ज्वॉइन्ट, गंगाभवानी, कावेरी, जावा स्याम, लक्षद्वीप ऑर्डिनरी, कपाडम, टाँल, माइक्रो, लक्षद्वीप रंगून, तेगाई और घई आदि ऐसी किस्में है, जो इस प्रजाति के अंतर्गत आती है |

बौनी प्रजाति

बौनी प्रजाति क़िस्म का पौधा आकार में अधिक छोटा पाया जाता है | अन्य प्रजातियों की तुलना में इसके पेड़ो की लम्बाई और आयु दोनों ही कम होती है | नारियल की यह क़िस्म गैर- परंपरागत क्षेत्रों में बहुत कम पैदावार देती है | इसके पौधों को अधिक पानी और अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है |

इस प्रजाति की अन्य किस्में इस प्रकार है:- मालद्वीप ड्वार्फ, लक्षद्वीप ड्वार्फ, ड्वार्फ- ग्रीन, चेन्थेंगू, फिलीपीन ड्वार्फ, लक्षद्वीप स्मॉल, अंडमान ड्वार् और चावट ड्वार्फ आदि |

संकर प्रजाति

नारियल की यह एक संकर प्रजाति है, जिसे बौनी और लम्बी प्रजाति के साथ संकरण कर तैयार किया गया है | इस क़िस्म को खासकर अलग-अलग जलवायु के हिसाब से उत्पादन देने के लिए तैयार किया गया है | इस क़िस्म के अलावा 10 अन्य किस्मो को तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय और केरल कृषि विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया है | इसके पौधों की ठीक से देख-रेख कर अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है |

नारियल के खेत की जुताई और उवर्रक (Coconut Field Plowing and Fertilizer)

नारियल के पौधों को खेत में लगाने से पहले उसके खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लिया जाता है | खेती की अच्छी तरह से जुताई कर उसे समतल बना लिया जाता है | समतल खेत में जलभराव की समस्या नहीं देखने को मिलती है | खेत की जुताई के बाद तैयार खेत में पौधों को लगाने के लिए गड्डो को तैयार कर लिया जाता है | इन गड्डो को पंक्तियों में तैयार किया जाता है, जिसमे प्रत्येक पंक्ति के मध्य 20 से 25 फ़ीट की दूरी रखी जाती है, तथा प्रत्येक गड्डे के बीच में 15 से 20 फ़ीट की दूरी रखते हुए एक मीटर गहरे और चौड़े गड्डे तैयार कर लिए जाते है | गड्डो को तैयार करते समय उसमे 20 से 25 KG गोबर की खाद के साथ 1:2:2 के अनुपात में N.P.K. की 500 GM मात्रा को मिट्टी में अच्छे से मिलकर भरना होता है |

नारियल के पौधों को लगाने का सही समय और तरीका (Plant Coconut Plants Right time and Way)

नारियल के पौधों की रोपाई पौध के रूप में की जाती है | इसके पौधों को जून के महीने में लगाया जाता है, किन्तु बारिश के मौसम में इसके पौधों की रोपाई नहीं करनी चाहिए | नारियल के पौधों की रोपाई खेत में तैयार गड्डो में की जाती है, यदि खेत में सफ़ेद चिटी का प्रकोप दिख रहा हो तो पौधों को रोपने से पहले उन्हें सेविडोल 8जी की 5 ग्राम की मात्रा से उपचारित कर ले | इसके बाद खेत में तैयार गड्डो में खुरपी से छोटा सा गड्डा बना लिया जाता है, फिर इन गड्डो में पौधों की रोपाई कर दी जाती है | इसके बाद गड्डे से निकाली गई मिट्टी से पौधों को लगाने के बाद ऊपर से ढक दिया जाता है | इसके पौधों की रोपाई जून से सितम्बर माह के मध्य में की जा सकती है |

नारियल के पौधों की सिंचाई और देखरेख (Coconut Plants Irrigation and Maintenance)

नारियल के पौधों को 3 से 4 वर्षो तक अधिक देखरेख की आवश्यकता होती है, इस दौरान इन्हे अधिक ठण्ड और गर्म से बचाना होता है | आरम्भ में नारियल के पौधों को विकास करने के लिए उचित मात्रा में वायु की आवश्यकता होती है | नारियल की संकर प्रजाति की किस्मो को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है | गैर-परंपरागत क्षेत्रों में केवल संकर प्रजाति के पौधों को उगाया जाता है | यदि पौधों की रोपाई बारिश के मौसम में की गई है, तो इन्हे अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | किन्तु अगर पौधे बारिश के मौसम में नहीं लगाए गए है, तो उन्हें तुरंत सिंचाई की आवश्यकता होती है |

गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को 3 से 4 दिन के अंतराल में पानी देना होता है, तथा सर्दियों के मौसम में इसके पौधों की सिंचाई सप्ताह में एक बार की जाती है | ड्रिल विधि द्वारा पौधों की सिंचाई करना काफी उपयुक्त होता है, क्योकि इससे पौधों को उचित मात्रा में पानी प्राप्त हो जाता है,और पोंधा अच्छे से विकास भी कर पाता है |

नारियल के पौधों में खरपतवार नियंत्रण एवं अतिरिक्त कमाई (Coconut Plants Weed Controland ExtraIncome)

नारियल के पौधों में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक विधि द्वारा की जाती है, इसके लिए पौधों की निराई – गुड़ाई की जाती है | इसके पौधों को वर्ष में तीन से चार गुड़ाई की आवश्यकता होती है | नारियल के पौधों को तैयार होने में 5 से 8 वर्ष का लम्बा समय लग जाता है, इस दौरान यदि किसान भाई चाहे तो खाली पड़ी भूमि में दलहन या मसाला खेती कर अतिरिक्त कमाई भी कर सकते है | इससे उन्हें पैदावार प्राप्त होने तक आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ेगा |

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नारियल के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Coconut Plants Diseases and Their Prevention)

गैंडा भृंग

इस क़िस्म का रोग नारियल के पौधों पर राइनोसोरस बीटल नामक कीट की वजह से देखने को मिलता है | यह कीट पौधों की नई शाखाओ को खाकर नष्ट कर देता है | इस कीट से पौधों को बचाने के लिए शाखाओ पर जब इस तरह का कीट दिखाई दे तो उसे निकाल देना चाहिए, इसके अलावा पत्तियों की कोपल में सेविडॉल 8 जी की 25 GM की मात्रा को 200 GM बालू में मिलाकर भर दे |

फल सड़न रोग

यह सड़न रोग नारियल की पैदावार को अधिक प्रभावित करता है | यह रोग फल के डंठल को पूरी तरह से सड़ा देता है, जिससे कम समय में ही फल सड़कर पूरी तरह से ख़राब हो जाता है | इस रोग से बचाव के लिए नारियल के पौधों पर बोर्डो मिश्रण या फाइटोलॉन की उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता है |

कली सड़न

नारियल के पौधों पर लगने वाला यह रोग अधिक खतरनाक होता है | इस रोग के लग जाने से पौधा पूरी तरह से नष्ट हो जाता है | यह रोग पौधों की कलियों पर आक्रमण करता है, जिससे पौधे की कालिया मुरझाने लगती है, तथा रोग से अधिक प्रभावित होने पर पौधे का शीर्ष भाग इस रोग की चपेट में आ जाता है, और पौधे से सड़ने की बदबू आने लगती है | इस रोग से बचाव के लिए बोर्डो मिश्रण का छिड़काव पौधों पर सप्ताह में दो बार करना होता है |

नारियल के फलो की तुड़ाई पैदावार और लाभ (Coconut Plants Harvesting Yield and Benefits)

नारियल के पेड़ो से फलो की तुड़ाई करना अधिक कठिन कार्य है, क्योकि इसके फल पेड़ के बिलकुल शीर्ष पर लगे होते है, जिसके लिए पेड़ पर चढ़कर इसकी तुड़ाई की जाती है | इसक फलो को तैयार होने में 15 महीने का समय लग जाता है, किन्तु जरूरत के हिसाब से इसके फलो को 15 महीने से पहले भी तोड़ सकते है | यदि आप नारियल के पानी के लिए इसकी तुड़ाई करना चाहते है, तो फल के हरा दिखाई देने पर उन्हें तोड़ ले | इसके अलावा अगर आप पके फलो की तुड़ाई करना चाहते है, तो फल के पीला दिखाई देने पर तुड़ाई की जाती है | पूर्ण रूप से पके फल से पर्याप्त मात्रा में तेल और रेशे प्राप्त हो जाते है |

नारियल के एक हेक्टेयर के खेत से एक बार की फसल से 50 क्विंटल तक की पैदावर प्राप्त की जा सकती है | इसके पेड़ 80 वर्षो तक फल देते है | इससे आदमी अच्छा भाव प्राप्त कर सकता है, कच्चा व पका नारियल बेच सकता है | नारियल का बाज़ारी भाव गुणवत्ता और उपयोग के हिसाब से काफी अच्छा होता है, जिससे किसान भाई नारियल की खेती कर अच्छा लाभ कमा सकते है |

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