अजवाइन की खेती कैसे होती है | Ajwain Farming in Hindi | अजवाइन की कीमत

अजवाइन की खेती (Ajwain Farming) से सम्बंधित जानकारी

अजवाईन (Thyme) एक झाड़ीनुमा वनस्पति है, जिसे मसाले एवं औषधि के रूप में प्रयोग में लाया जाता है | इसकी खेती को छोटे पैमाने पर किया जाता है | यह देखने में धनिया कुल प्रजाति का पौधा होता है, इसकी लम्बाई लगभग एक मीटर तक होती है | अजवाईन के दानो में कई तरह के खनिज तत्वों का मिश्रण उपस्थित होता है, जो मानव शरीर के लिए काफी लाभदायक होता है |

इसके दानो से तेल निकालकर ओषधियो के रूप में इस्तेमाल किया जाता है | आयुर्वेदिक चिकित्षक में इसके दानो को पीसकर उपयोग में लाया जाता है | अजवाईन एक बहुत ही फायदेमंद वनस्पति है | यदि आप भी अजवाईन की खेती करने का मन बना रहे है, तो यहाँ पर आपको अजवाइन की खेती कैसे होती है, Ajwain Farming in Hindi, अजवाइन की कीमत आदि के बारे में पूरी जानकारी दी जा रही है |

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अजवाईन की खेती कैसे करे (Celery Cultivation)

अजवाईन की खेती को करने का एक ही समय रबी की फसल का होता है | अजवाईन की खेती में अधिक बारिश की आवश्यकता नहीं होती है तथा सर्दियों का मौसम इसके पौधों को विकास करने के लिए काफी अच्छा माना जाता है | इसके पौधे सर्दियों में गिरने वाले पाले को भी सहन कर लेते है | अजवाईन का बाजारी भाव काफी अच्छा होता है | इसलिए किसान अजवाईन की खेती कर अच्छी कमाई कर सकते है |  

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अजवाईन की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी जलवायु और तापमान (Suitable Soil Climate and Temperature)

इसकी खेती की लिए जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है | इसके अतिरिक्त यदि आप अधिक पैदावार प्राप्त करना चाहते है, तो आपको बलुई मिट्टी में इसकी खेती को करना चाहिए | अधिक नमी तथा जलभराव वाली जगहों पर इसकी खेती को नहीं किया जा सकता है | अजवाईन की खेती में भूमि का P.H मान 6.5 से 8 के मध्य होना चाहिए |

इसका पौधा उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा कहा जाता है | इसलिए इसके पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है | किन्तु फूलो के बीजो को पकने के दौरान इसे गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है, तथा इसके लिए बिलकुल खुली धूप होनी चाहिए | भारत में अजवाईन की खेती को महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में मुख्य रूप से उगाया जाता है |

अजवाईन के पौधों को आरम्भ में विकसित होने के लिए 20 से 25 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है | सर्दियों के मौसम में यह पौधे न्यूनतम 10 डिग्री तापमान पर अच्छे से विकास करते है | पौधों में लगे दानो को पकने के लिए 30 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है |

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अजवाईन की किस्मे – Varieties Of Ajwain

वर्तमान समय में अजवाईन की पैदावार को बढ़ाने के लिए बाजार में कई तरह की किस्मे मौजूद है | जिन्हे अलग – अलग जलवायु के हिसाब से अलग – अलग स्थानों पर उगाया जाता है | यह सभी पककर तैयार होने के उत्पादन के आधार पर की जाती है |

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लाभ सलेक्शन 1 किस्म के पौधे

अजवाईन की यह किस्म कम समय में पैदावार को तैयार करने के लिए तैयार की गयी है | इस किस्म को राजस्थान और गुजरात के कुछ भागो में उगाया जाता है | इसमें पौधों के दाने बीज रोपाई के लगभग 130 से 140 दिन पककर तैयार हो जाते है | इसमें पौधा एक मीटर तक लम्बा होता है | इसका प्रति हेक्टयेर उत्पादन 8 से 9 क्विंटल के मध्य होता है |

लाभ सलेक्शन 2 किस्म के पौधे

पौधों की यह किस्म सिंचित और असिंचित दोनों ही भूमि में अधिक उत्पादन देने के लिए उगाई जाती है | इसमें पौधे लगभग 135 दिन में पककर तैयार हो जाते है | इसमें प्रति हेक्टयेर उत्पादन 10 क्विंटल तक होता है |

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अजवाइन की इस किस्म को नेशनल रिसर्च फॉर सीड स्पाइस, तबीजी, अजमेर द्वारा देरी से पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है, इसमें पौधे एक से डेढ़ मीटर ऊँचे होते है | इसके पौधों में प्रति हेक्टेयर में लगभग 15 क्विंटल तक का उत्पादन होता है | इसे किसी भी मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है, बीज रोपाई के लगभग 170 दिन के बाद इसके पौधे पककर तैयार हो जाते हैं |

इसके अतिरिक्त भी अजवाईन की कई किस्मे पायी जाती है जिनमे ऐ ऐ 2,आर ए 1-80,गुजरात अजवाइन 1,आर ए 19-80 जैसी किस्मे मौजूद है |

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अजवाइन के खेत और पौधों की तैयारी

अजवाइन की खेती में भुरभुरी और साफ मिट्टी की आवश्यकता होती है | खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट करने के लिए खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई कर दे जिससे सभी पुराने अवशेष निकल जायेंगे | इसके बाद खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर खेत को कुछ दिनों के लिए ऐसे ही छोड़ दें, इससे मिट्टी में मौजूद सभी हानिकारक कीट सूर्य की तेज़ धूप के संपर्क में आकर नष्ट हो जायेंगे |

जुताई के बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद को डालकर मिट्टी में अच्छे से मिला दिया जाता है | खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए कल्टीवेटर के माध्यम से खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दें तथा बाद में  खेत में पानी चलाकर खेत का पलेव कर दें | पलेव करने के कुछ दिन बाद खेत की ऊपरी मिट्टी सूखी दिखाई देने लगे तो एक बार फिर से इसकी जुताई करना होता है | उसके बाद खेत में रासायनिक खाद का उचित मात्रा में छिड़काव कर खेत में रोटावेटर चला दें | इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी होती जाती है, इसके बाद खेत में पाटा लगा कर चला दे जिससे खेत बिलकुल समतल हो जायेगा |

अजवाईन की फसल को बीज और पौधे दोनों ही तरीके से कर सकते है | पौधों द्वारा खेत में रोपाई के लिए पौधों को नर्सरी में एक महीने पहले ही तैयार कर लिया जाता है | इसके लिए इन्हे क्यारियों या फिर प्रो – ट्रे में तैयार किया जाता है | इसके अतिरिक्त यदि आप खेत में बीजो की रोपाई करना चाहते है तो रोपाई से पहले बीजो को बाविस्टीन की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए | इसके बाद इसके बीजो की खेत में रोपाई कर देना चाहिए |

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अजवाइन के पौंधों और बीजो की रोपाई का सही समय और तरीका (Planting Seeds)

अजवाईन के पौधों की रोपाई को बीज और पौधों दोनों ही तरीको से किया जाता है | किन्तु पौधों के रूप में इसकी खेती को करना ज्यादा बेहतर माना जाता है|

छिडकाव विधि से बीजो की रोपाई

बीज के माध्यम से रोपाई के दौरान इसके पौधों की रोपाई छिडकाव विधि का इस्तेमाल कर की जाती है | इस विधि से रोपाई करने में तीन से चार किलो बीजो की आवश्यकता होती है | बीजो को रोपाई से पहले उपचारित भी किया जाता है | ताकि बीजों के अंकुरण के समय किसी भी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े |

बीजो की रोपाई से पहले खेत में सामान दूरी रखते हुए क्यारियों को तैयार कर लिया जाता  है | इसके बाद मिट्टी में बीजो को दंताली या हाथों की मदद से एक सेंटीमीटर तक गहराई में मिला दिया जाता है | अधिक गहराई में दबाने से इसके अंकुरण में परेशानी हो सकती है |

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पौधों की कतारों में रोपाई

पौधों के रूप में इसके पौधों की खेत में रोपाई करते समय सामान दूरी रखते हुए मेड बनाकर करनी चाहिए | मेड पर पौधों की रोपाई करते वक़्त प्रत्येक पौधे के बीच में 25 सेंटीमीटर की दूरी होनी चाहिए |

दोनों ही तरह की रोपाई में पौधों की अगेती और पछेती किस्मो के आधार पर की जाती है | अगेती किस्मो की रोपाई सितम्बर माह के अंत में तथा अक्टूबर माह के मध्य तक कर देनी चाहिए |

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पौधों की सिंचाई तथा उवर्रक की मात्रा (Irrigation and Fertilizers)

दोनों ही तरह की विधियों द्वारा पौधों की रोपाई नम भूमि में होती है | इसलिए दोनों ही विधियों में रोपाई के तुरंत बाद इसकी पहली सिंचाई कर देनी चाहिए | सिचाई करते समय पानी के बहाव को धीमा ही रखे जिससे इसके बीजो के बहने का खतरा न हो | इसके पौधों में सिचाई की अधिक आवश्यकता नहीं होती है | जब पौधों का अंकुरण होने लगा हो उस दौरान जरूरत पड़ने पर ही 10 से 15 दिन के अंतराल में पानी देना चाहिए |

अजवाइन की फसल में सामान्य उवर्रक की आवश्यकता होती है | उवर्रक की इस मात्रा को खेत को तैयार करते वक़्त दिया जाता है | इसके लिए खेत में 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को खेत में डालकर मिट्टी में अच्छे से मिला दिया जाता है और रासायनिक खाद के रूप में तक़रीबन 80 किलो एन.पी.के. की मात्रा को भी खेत की आखरी जुताई के समय खेत में छिड़कवा देना चाहिए | इसके अलावा पौधों के विकास के दौरान 25 किलो यूरिया खाद को पौधों पर छिड़कवा देना चाहिए |

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खरपतवार पर रोक (Weed Control)

बाकि सभी फसलों की तरह ही अजवाइन के पौधों को भी खरपतवार से बचाना होता है | किन्तु इसके पौधों में खरपतवार पर नियंत्रण को प्राकृतिक तरीके से ही करना चाहिए | प्राकृतिक तरीके से खरपतवार पर नियंत्रण करने के लिए इसके पौधों की 25 से 30 दिन में पहली गुड़ाई कर खरपतवार को निकाल देना चाहिए | इसके अलावा समय – समय पर जब भी खेत में खरपतवार दिखाई दे तो उसकी निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए |

पौधों के रोग एवं उनकी रोकथाम

अजवाईन के पौधों में भी कई तरह के कीट और जीवाणु जनित रोगो का प्रकोप देखने को मिल जाता है | जिसकी रोकथाम न की जाये तो पैदावार को भी काफी नुकसान पहुँच सकता है | जिसकी जानकारी इस प्रकार है:-

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माहू कीट रोग

इस तरह के रोगो का प्रभाव जलवायु परिवर्तन के समय ही देखने को मिलता है | इस रोग के कीट पौधों की पत्तियों और कोमल भागो पर जमा होकर उनका रस चूसकर पौधे के विकास को रोक देता है | इस रोग से अधिक प्रभावित हो जाने पर पौधा पूरी तरह से नष्ट हो जाता है | यह कीट देखने में लाल,पीले और हरे रंग के होते है | इस रोग की रोकथाम के लिए डाइमिथोएट, मैलाथियान या मोनोक्रोटोफास की उचित मात्रा का छिड़काव करना चाहिए |

झुलसा रोग (Scorch Disease)

यह झुलसा रोग फंफूद की वजह से फैलता है | पौधों में अधिक समय तक नमी बने रहने के कारण पौधों पर इस तरह के रोग का प्रकोप देखने को मिलता है | यह रोग सबसे पहले पत्तियों को प्रभावित करता है जिससे पत्तियों पर हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते है | सही समय पर इसकी रोकथाम न करने से पत्तिया सूखकर नष्ट हो जाती है | पौधों पर मैंकोजेब का छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है |

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चूर्णिल आसिता रोग

यह रोग पौधों में कवक के रुप में पाए जाते है | चूर्णिल आसिता रोग से प्रभावित पौधे की पत्तिया सफ़ेद रंग की धब्बेदार हो जाती है | सही समय पर इस रोग से बचाव न करने पर धब्बो का आकार बढ़ने लगता है और पत्तियों पर सफ़ेद रंग का पाउडर जमा हो जाता है | घुलनशील गंधक का इस्तेमाल कर इस रोग से पौधों को बचाया जा सकता है |

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फसल की कटाई पैदावार और लाभ (Yield and Profit)

अजवाइन के पौधे रोपाई के लगभग 140 से 160 दिन बाद पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते है | इसके पौधों में लगने वाले गुच्छे पकने के बाद भूरे रंग के दिखाई देने लगते है | उस दौरान इसके पौधों की कटाई कर उन्हें खेत में एकत्रित कर अच्छे से सूखा लिया जाता है | जब इसके दाने अच्छे से सूख जाये तब इन गुच्छो को लकड़ी की डंडी से पीटकर दानो को अलग कर लेना चाहिए |

अजवाइन की किस्मो में प्रति हेक्टेयर औसतन 10 क्विंटल तक का उत्पादन प्राप्त होता है | अजवाइन का बाजारी भाव 12 हजार से 20 हजार रूपए प्रति क्विंटल तक होता है | इस तरह से किसान भाई एक हेक्टेयर के खेत में अजवाइन की फसल कर सवा दो लाख तक की कमाई कर सकते है |

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